असलम अहमद मुलताई
पुरातत्व विभाग ने कभी लिया था संज्ञान, लेकिन संरक्षण के प्रयास हुए बेअसर; पत्थरों पर उकेरी नायाब कलाकृतियां आज भी समेटे हैं सदियों पुराना इतिहास,
मुलताई। ताप्ती नदी के तटीय ग्राम डोहलन में मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित क्षेत्र के रूप में चिह्नित ऋषि बाबा मंदिर एवं माता मंदिर प्राचीन वास्तुकला और संस्कृति के अमूल्य खजाने को अपने भीतर समेटे हुए हैं। मंदिर परिसर और आसपास आज भी प्राचीन स्थापत्य के अवशेष, विशाल पत्थरों के स्तंभ, नक्काशीदार शिलाखंड और आकर्षक प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक विरासत को सहेजने और विकसित करने के लिए अब तक कोई ठोस और व्यापक प्रयास नहीं हो सके हैं। बताया जाता है कि पुरातत्व विभाग ने वर्षों बाद इन प्राचीन धरोहरों की सुध लेते हुए यहां कुछ निर्माण कार्य कराए थे तथा मंदिर के संरक्षित क्षेत्र होने की जानकारी देने वाला सूचना पटल भी लगाया गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद निर्माण कार्यों की स्थिति खराब होने लगी और सूचना पटल भी गायब हो गया। ऐसे में ऐतिहासिक महत्व रखने वाली यह धरोहर आज भी उचित संरक्षण की बाट जोह रही है।

प्राचीनता का प्रमाण हैं ऋषि बाबा और माता मंदिर,
मुलताई से लगभग 18 किलोमीटर दूर मासोद मार्ग पर ताप्ती नदी के किनारे स्थित ग्राम डोहलन को अत्यंत प्राचीन ग्राम माना जाता है। यहां स्थित ऋषि बाबा मंदिर और माता मंदिर इसकी प्राचीनता के महत्वपूर्ण प्रमाण माने जाते हैं। ऋषि बाबा मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग विशेष आकर्षण का केंद्र है। ग्रामीणों के अनुसार यह शिवलिंग सामान्य शिवलिंगों से आकार और स्वरूप में अलग दिखाई देता है और इसे अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। मंदिर कितना पुराना है, इसकी प्रमाणिक जानकारी ग्रामीणों के पास नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी अनेक मान्यताएं और दंतकथाएं आज भी प्रचलित हैं। समय के साथ मंदिर के स्वरूप में बदलाव आया है। रखरखाव के अभाव में इसके प्राचीन वैभव को नुकसान भी पहुंचा है, लेकिन पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और मंदिर की दीवारों एवं द्वार पर उकेरी गई कलाकृतियां आज भी इसकी समृद्ध स्थापत्य परंपरा की गवाही देती हैं।

बिखरे पड़े हैं विशाल मंदिर के अवशेष,
ऋषि बाबा मंदिर के समीप स्थित माता मंदिर परिसर में प्राचीन विशाल मंदिर के अवशेष आज भी जगह-जगह दिखाई देते हैं। परिसर में विशाल पत्थरों से निर्मित स्तंभ और स्तंभों को स्थापित करने के लिए तराशे गए पत्थर के आधार मौजूद हैं। इन आधारों पर नाग की आकृतियां उकेरी गई हैं, जबकि स्तंभों पर सूर्य और चंद्रमा की आकृतियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। आज यहां विशाल मंदिर का मूल स्वरूप भले ही मौजूद नहीं है, लेकिन बिखरे पड़े इन अवशेषों पर उकेरी गई कलाकृतियां किसी अनसुलझी ऐतिहासिक पहेली से कम नहीं हैं। ये अवशेष मानो अपने गौरवशाली अतीत की कहानी स्वयं बयां कर रहे हैं। माता मंदिर के प्रवेश द्वार पर उकेरी गई प्रतिमाएं और नक्काशी ताप्ती तट पर विकसित हुई प्राचीन सभ्यता और स्थापत्य कला की समृद्ध परंपरा का आभास कराती हैं।

तपोस्थली रहे हैं ताप्ती तट के ये क्षेत्र,
डोहलन के ग्रामीणों के अनुसार इन मंदिरों के प्राचीन इतिहास की जानकारी रखने वाले लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं। हालांकि, बुजुर्गों से सुनी गई मान्यताओं के अनुसार ऋषि बाबा मंदिर में कई वर्ष पूर्व एक ऋषि निवास करते थे और उन्होंने यहां तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान को ऋषि बाबा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं आज भी ग्रामीणों में प्रचलित हैं। चैत्र मास की पूर्णिमा पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों सहित दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं और मनोकामना पूरी होने की कामना करते हैं।

पत्थरों पर उकेरी गईं आकर्षक प्रतिमाएं
ऋषि बाबा मंदिर के सामने प्राचीन मंदिर के अवशेष दिखाई देते हैं। यहां मंदिर का परकोटा, प्रवेश द्वार और चबूतरा आज भी मौजूद है। चबूतरे की बनावट भी प्राचीन मंदिर स्थापत्य की विशिष्ट शैली को दर्शाती है। चबूतरे के ऊपर बना प्रवेश द्वार वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। द्वार पर की गई बारीक नक्काशी और कारीगरी सहज ही लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। मंदिर के विभिन्न हिस्सों में भगवान गणेश, नटराज, ऋद्धि-सिद्धि, भगवान राम सहित अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। इसके अलावा पत्थरों पर अटखेलियां करती युवतियों की आकृतियां भी दिखाई देती हैं। वर्षों पुरानी ये प्रतिमाएं आज भी इतनी जीवंत प्रतीत होती हैं, मानो उनमें प्राण बसते हों। पत्थरों पर उकेरी गई ये आकृतियां तत्कालीन कलाकारों की कल्पनाशीलता और उत्कृष्ट शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण हैं।

नहीं हुई प्राचीन अवशेषों की विस्तृत खोज
डोहलन में जिस तरह प्राचीन मंदिरों के अवशेष बिखरे पड़े हैं, उन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कभी यहां कोई विशाल मंदिर परिसर अस्तित्व में रहा होगा। ग्रामीणों का मानना है कि क्षेत्र की विस्तृत पुरातात्विक जांच कराई जानी चाहिए। उनका कहना है कि मंदिर के आसपास स्थित टीले के नीचे भी प्राचीन मंदिर या अन्य ऐतिहासिक अवशेष दबे हो सकते हैं। धनराज गव्हाड़े बताते हैं कि पहले ऋषि बाबा मंदिर से ताप्ती तट तक पहुंचने का मार्ग था। वर्ष 1991 में चंदोरा बांध टूटने के बाद आई बाढ़ के दौरान ताप्ती तट के दोनों हिस्से खुल गए थे। उस समय ऋषि बाबा मंदिर के निचले हिस्से में सीढ़ियां और चबूतरा दिखाई दिया था। क्षेत्र में मिले बड़े-बड़े पत्थर के स्तंभ भी इस बात की संभावना को मजबूत करते हैं कि यहां कभी विशाल मंदिर या मंदिर परिसर रहा होगा।
धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है क्षेत्र
ताप्ती तट पर स्थित ऋषि बाबा मंदिर एवं माता मंदिर को व्यवस्थित रूप से विकसित कर आकर्षक धार्मिक एवं पर्यटन स्थल का स्वरूप दिया जा सकता है। इस दिशा में ग्राम पंचायत डोहलन के सहयोग से प्रयास कर रहे सेवानिवृत्त एई आरसी गव्हाड़े का कहना है कि थोड़े से प्रयास और सुनियोजित विकास से इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण धार्मिक पर्यटन स्थल बनाया जा सकता है। गव्हाड़े के अनुसार ग्राम पंचायत की अपनी सीमाएं होती हैं। इन्हीं सीमाओं में रहते हुए क्षेत्र में घाट और प्रतीक्षालय का निर्माण कराया गया है। हालांकि, इसे बड़े धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि मंदिर क्षेत्र में लगभग 8 से 10 एकड़ भूमि उपलब्ध है। सीमांकन कर क्षेत्र को सुरक्षित करने के साथ बाउंड्रीवॉल का निर्माण कराया जा सकता है। इसके बाद यहां सुंदर उद्यान, श्रद्धालुओं के लिए विश्राम गृह बनाकर ताप्ती तटो को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सुंदर रूप दिया जा सकता है अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। ग्राम पंचायत द्वारा मार्ग निर्माण किए जाने के बाद मंदिर तक पहुंचने की दूरी और कठिनाई भी काफी कम हुई है। यदि एक छोटी पुलिया और संपर्क मार्ग का निर्माण करा दिया जाए तो मंदिर तक पहुंच आसान हो सकती है।

संरक्षण और शोध की जरूरत
ताप्ती तट पर मौजूद ऋषि बाबा और माता मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की प्राचीन कला, संस्कृति और स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण साक्ष्य भी हैं। यदि पुरातत्व विभाग द्वारा यहां वैज्ञानिक सर्वेक्षण और विस्तृत पुरातात्विक शोध कराया जाए तथा प्राचीन अवशेषों का संरक्षण किया जाए, तो डोहलन की यह विरासत मुलताई क्षेत्र के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को नई पहचान दे सकती है।


