गिद्ध और गौरैया के बाद अब बगुलों की घटती संख्या बढ़ा रही चिंता,

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मुलताई। सतपुड़ा की मनमोहक वादियों में बसा मुलताई क्षेत्र कभी प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्ध जैव विविधता और वन्य जीवों-पक्षियों की विविध प्रजातियों के लिए देशभर में पहचान रखता था। यहां के घने वन, नदियां, तालाब, कुएं और जलाशय अनेक पक्षियों का प्राकृतिक आवास हुआ करते थे। लेकिन बदलते पर्यावरणीय हालात, अंधाधुंध प्राकृतिक दोहन और बढ़ते प्रदूषण के कारण अब इस क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन (इकोसिस्टम) लगातार बिगड़ता जा रहा है। गिद्ध और गौरैया जैसी पक्षी प्रजातियों के बाद अब सफेद बगुलों की लगातार घटती संख्या भी पर्यावरण प्रेमियों और विशेषज्ञों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।

कभी ताप्ती सरोवर, नदियों, तालाबों और बांधों के किनारे स्थित ऊंचे वृक्षों पर सैकड़ों की संख्या में दिखाई देने वाले बगुलों के झुंड अब बहुत कम नजर आते हैं। आसमान में उड़ते सफेद बगुलों के समूह बच्चों के लिए कौतूहल का विषय हुआ करते थे, लेकिन आज उनका दिखना भी दुर्लभ होता जा रहा है।

बुजुर्ग बताते हैं कि मुलताई क्षेत्र की हरियाली, प्रचुर जलस्रोत और प्राकृतिक वातावरण के कारण यहां बगुलों सहित अनेक पक्षियों की भरमार रहती थी। क्षेत्र से निकलने वाली नदियां, नाले, तालाब और कुएं पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय और भोजन का प्रमुख स्रोत थे। समय के साथ जलस्रोत सिकुड़ते गए, हरित क्षेत्र कम होता गया और प्राकृतिक आवास नष्ट होने लगे। इसका सीधा प्रभाव पक्षियों की संख्या पर पड़ा। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बगुले दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी संख्या पहले की तुलना में काफी कम रह गई है।

समुद्र तल से लगभग 765 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मुलताई, पचमढ़ी के बाद प्रदेश के ऊंचे क्षेत्रों में शामिल है। कभी यह क्षेत्र अपने सुहावने मौसम के कारण राजा-महाराजाओं की ग्रीष्मकालीन विश्राम स्थली माना जाता था। लेकिन पिछले दो दशकों में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, फलदार वृक्षों का समाप्त होना, अवैध उत्खनन और अनियोजित विकास ने यहां के पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित किया है। इसका असर बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है, जिससे किसान भी प्रभावित हो रहे हैं।

ग्राम ताईखेड़ा और चंदोरा के बीच स्थित एक खेत में धनिया की फसल की निराई कर रही महिला के आसपास बड़ी संख्या में बगुले भोजन तलाशते दिखाई दिए। स्थानीय ग्रामीण राहुल नरवरे बताते हैं कि बगुले फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि खेत में मौजूद हानिकारक कीटों को खाकर किसानों की मदद करते हैं। बुवाई के समय भी यह किसानों के साथ चलते हैं और बीज खाने के बजाय फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का शिकार करते हैं।

ग्रामीण पृथ्वी पवार का कहना है कि खेतों में नियमित रूप से काम करने वाले किसानों को बगुले पहचानने लगते हैं। किसान के साथ-साथ चलते हुए वे मिट्टी में छिपे कीटों को निकालकर खाते रहते हैं। किसानों द्वारा उन्हें भगाने का प्रयास करने पर भी वे अधिक दूर नहीं जाते। यह दृश्य मानव और प्रकृति के बीच वर्षों पुराने विश्वास और सह-अस्तित्व के संबंध को दर्शाता है। हालांकि, पहले जहां ऐसे बगुलों के बड़े-बड़े झुंड दिखाई देते थे, अब उनकी संख्या लगातार घट रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जलस्रोतों का संरक्षण, वनों का संवर्धन, रासायनिक दवाइयों का संतुलित उपयोग और प्राकृतिक आवासों की रक्षा के प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में बगुलों सहित अनेक पक्षी प्रजातियां भी इस क्षेत्र से पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकती हैं। प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर गंभीर प्रयास करने होंगे।


कृषि में रासायनिक कीटनाशकों और दवाइयों का बढ़ता उपयोग केवल मानव स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक साबित हो रहा है। खेतों में मिलने वाले कीट जहरीले रसायनों से प्रभावित होते हैं, जिन्हें खाने वाले पक्षियों के स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बगुलों सहित कई पक्षी प्रजातियों की संख्या लगातार घट रही है।
आर.के. मलवीय
पर्यावरणविद् एवं प्रभारी प्राचार्य सांदीपनि  विद्यालय बैतूल बाजार

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