दवाओं के बगैर पक्के बिल के हो रहा है करोड़ों का व्यापार,

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मुलताई। नगर में जीवनरक्षक दवाइयों के कारोबार को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आम नागरिकों का कहना है कि दवा जैसा संवेदनशील और जीवन-मृत्यु से जुड़ा क्षेत्र भी अब अनियमितताओं की आशंकाओं से घिरता जा रहा है। बिना पक्के बिल के दवाओं की बिक्री, लाइसेंस संबंधी नियमों के पालन पर संदेह तथा प्रतिबंधित दवाओं की कथित आसान उपलब्धता जैसे मुद्दों ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। नागरिकों ने संबंधित विभाग से मेडिकल स्टोरों की व्यापक और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।


जानकारों का कहना है कि नगर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मेडिकल स्टोरों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। आरोप है कि कई स्थानों पर लाइसेंस किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर है, जबकि संचालन कोई और कर रहा है। यदि ऐसा है तो यह गंभीर जांच का विषय है। औषधि व्यवसाय से जुड़े नियमों के अनुसार मेडिकल स्टोर पर पंजीकृत फार्मासिस्ट की उपलब्धता तथा निर्धारित मानकों का पालन अनिवार्य है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्येक दवा की खरीद पर उपभोक्ता को पक्का बिल लेना चाहिए। यदि दवा का बिल नहीं मिलता, तो भविष्य में किसी प्रतिकूल प्रभाव या दवा संबंधी विवाद की स्थिति में यह साबित करना कठिन हो जाता है कि संबंधित दवा किस मेडिकल स्टोर से खरीदी गई थी। ऐसे मामलों में उपभोक्ता के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता दीपक पवार का कहना है कि कई बार चिकित्सक द्वारा लिखी गई दवा के स्थान पर उसका विकल्प (सब्स्टीट्यूट) दिया जाता है, लेकिन इसकी स्पष्ट जानकारी हमेशा उपभोक्ता को नहीं दी जाती। उनका कहना है कि मरीज को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसे डॉक्टर द्वारा लिखी गई वही दवा दी जा रही है या उसके स्थान पर कोई वैकल्पिक दवा उपलब्ध कराई जा रही है।

बीमारी और दवाइयों का भार आम आदमी के लिए बड़ी मुसीबत है।  किशोरी पवार बताते हैं कि स्थानिय मेडिकल दुकानों पर दवाइयों का बिल नहीं दिया जाता और हर आदमी पढ़ा लिखा होता नहीं कि, वह दवाइयों पर लिखे प्रिंट रेट को मिला सके। मेडिकल संचालक ग्राहकों को दी जाने वाली दवाइयों का हिसाब अपने पास रखें कोरे कागज पर लगाकर पैसे बता देता है और मेडिकल स्टोर संचालक द्वारा बताए गए पैसे देना ग्राहक की मजबूरी होती है।

प्रतिबंधित दवाओं की उपलब्धता पर भी उठ रहे प्रश्न

नगर में यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि कुछ प्रतिबंधित अथवा नियंत्रित दवाएं कथित रूप से बिना वैध चिकित्सकीय पर्चे के उपलब्ध हो जाती हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह गंभीर मामला है, क्योंकि ऐसी दवाओं के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। नागरिकों का कहना है कि इस संबंध में औषधि प्रशासन द्वारा समय-समय पर सघन जांच अभियान चलाए जाने चाहिए।

प्रशासन द्वारा पूर्व में मेडिकल स्टोर संचालकों को जहरीले पदार्थों और नियंत्रित दवाओं की बिक्री निर्धारित नियमों के अनुसार करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद यदि ऐसे पदार्थ बिना आवश्यक औपचारिकताओं के उपलब्ध हो रहे हैं, तो यह जांच का विषय है। नागरिकों का मानना है कि ऐसे मामलों में नियमित निरीक्षण और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दवा व्यवसाय से जुड़े नियमों के अनुसार मेडिकल स्टोर पर पंजीकृत फार्मासिस्ट का होना आवश्यक है। डी.फार्म या बी.फार्म जैसी निर्धारित शैक्षणिक योग्यता तथा संबंधित फार्मेसी परिषद में पंजीकरण के बाद ही फार्मासिस्ट के रूप में कार्य किया जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दवा केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ी जिम्मेदारी है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकती है।

नगर के नागरिकों ने जिला प्रशासन और औषधि नियंत्रण विभाग से मांग की है कि मेडिकल स्टोरों का नियमित निरीक्षण किया जाए, बिना बिल दवा बिक्री, लाइसेंस की वैधता, पंजीकृत फार्मासिस्ट की उपलब्धता तथा प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि आम नागरिकों को सुरक्षित और पारदर्शी दवा व्यवस्था उपलब्ध हो सके।

इनका कहना
जैसा कि अपने संज्ञान में लाया है तो देखते हैं कि कौन-कौन सी प्रतिबंध और जेनेरिक दवाई मेडिकल स्टोर से बिक रही है। जहां तक रूटीन जाच का मामला है संपूर्ण जिले की होती है। किंतु आपने कहां है तो बगैर बिल के दावओं का व्यापार और प्रतिबंधित दवा कहां बिक रही है यह भी देखेंगे।


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