असलम अहमद
पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर को जीवित रखे है झगेकर परिवार, बीजे और सीवन की लकड़ी से तैयार होती हैं बेजोड़ ढोलकें; दूर-दूर से खरीदने पहुंचते हैं लोग,
मुलताई। आधुनिक मशीनों और बदलती जीवनशैली के दौर में पूर्वजों से विरासत में मिले अनेक पारंपरिक ग्रामीण लघु उद्योग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। कभी गांवों की अर्थव्यवस्था और रोजगार का महत्वपूर्ण आधार रहे ये हुनर अब गिने-चुने परिवारों तक सिमटकर रह गए हैं। ऐसे समय में मुलताई तहसील के ग्राम गौला का झगेकर परिवार पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक कला को आज भी अपने हाथों की मेहनत से जीवित रखे हुए है। झगेकर परिवार के सदस्य मशीनों से तैयार होने वाली वस्तुओं के दौर में भी हाथों से ढोलक बनाने का काम कर रहे हैं। परिवार के लोग बीजे और सीवन जैसी लकड़ियों को आकार देकर पारंपरिक तरीके से सुंदर और मजबूत ढोलक तैयार करते हैं।
यही कारण है कि गौला में बनाई जाने वाली ढोलकों की पहचान आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज तक बनी हुई है। ढोलक के जानकारों का कहना है कि बाजार में मशीनों से तैयार होने वाली ढोलकों की तुलना में हाथ से बनाई गई ढोलक की बनावट, मजबूती और आवाज में अलग ही विशेषता होती है।
तीन भाइयों के परिवार आज भी जुटे हैं पारंपरिक काम में,
गौला गांव का झगेकर परिवार लंबे समय से ढोलक बनाने के पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। परिवार के तीन भाइयों के परिवार आज भी इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। बुजुर्गों से मिले हुनर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ-साथ परिवार के सदस्य स्वयं हाथों से ढोलक तैयार करते हैं। ढोलक बनाने की पूरी प्रक्रिया में काफी मेहनत और समय लगता है। लकड़ी का चयन करने से लेकर उसे उचित आकार देने, अंदर से खोखला करने, घिसाई करने और बाद में ढोलक को अंतिम रूप देने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद परिवार ने पारंपरिक तरीके को नहीं छोड़ा है। परिवार के सदस्यों के अनुसार हाथ से बनाई गई ढोलक की खासियत केवल इसकी सुंदर बनावट नहीं, बल्कि इसकी आवाज भी है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भजन-कीर्तन, धार्मिक आयोजनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य अवसरों के लिए ढोलक खरीदने वाले लोग गौला तक पहुंचते हैं।

बीजे की लकड़ी की ढोलक की आवाज मानी जाती है खास,
मुलताई निवासी रामदास देशमुख ने बताया कि उन्हें एक अच्छी गुणवत्ता वाली ढोलक खरीदनी थी। इसी दौरान उनके एक परिचित ने उन्हें जानकारी दी कि मुलताई क्षेत्र के गौला गांव में पारंपरिक तरीके से अच्छी गुणवत्ता की ढोलक बनाई जाती है। इसके बाद वे गौला पहुंचे, जहां उन्होंने अलग-अलग आकार और गुणवत्ता की कई ढोलकें देखीं। रामदास देशमुख के अनुसार वहां तैयार ढोलकों की बनावट और गुणवत्ता उन्हें काफी बेहतर लगी। विशेष रूप से उनकी आवाज में अलग तरह की मधुरता और दमदारपन महसूस हुआ। इसी कारण उन्होंने बाजार के बजाय गौला से ही ढोलक खरीदने का निर्णय लिया।झगेकर परिवार के सदस्यों ने बताया कि ढोलक बनाने के लिए अलग-अलग प्रकार की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है।

इनमें बीजे की लकड़ी से तैयार ढोलक को विशेष रूप से बेहतर माना जाता है। बीजे की लकड़ी से बनी ढोलक की आवाज मधुर होने के साथ-साथ दमदार भी होती है। हालांकि इस प्रकार की लकड़ी की कीमत अधिक होने के कारण इससे तैयार ढोलक भी अपेक्षाकृत महंगी होती है। वहीं, कम कीमत में ढोलक चाहने वाले ग्राहकों के लिए सीवन की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इससे भी अच्छी गुणवत्ता की ढोलक तैयार की जाती है और आम लोगों की जरूरत एवं बजट के अनुसार अलग-अलग कीमतों में ढोलक उपलब्ध हो जाती है।

बढ़ती लागत से पारंपरिक व्यवसाय पर पड़ रहा असर,
झगेकर परिवार के सदस्यों का कहना है कि वर्तमान समय में ढोलक बनाने में उपयोग होने वाली लकड़ी के साथ-साथ स्याही, चमड़ा और अन्य आवश्यक सामग्री के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर इस पारंपरिक व्यवसाय पर पड़ा है। ढोलक बनाने में मेहनत और समय दोनों अधिक लगते हैं। इसके बावजूद कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और बाजार में मशीनों से तैयार होने वाली वस्तुओं की उपलब्धता के कारण पारंपरिक कारीगरों के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। परिवार का कहना है कि पहले की तुलना में इस काम से होने वाली आमदनी प्रभावित हुई है, लेकिन पूर्वजों से मिली कला को समाप्त होने से बचाने के लिए वे आज भी इस काम से जुड़े हुए हैं।

बाजार में मशीनों से बनी ढोलक के बीच हाथ की कारीगरी की अलग पहचान,
मशीनों से बड़ी संख्या में तैयार होने वाली ढोलकों के कारण बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। इसके बावजूद हाथ से तैयार की गई ढोलक की अपनी अलग पहचान है। कारीगरों का कहना है कि हाथ से तैयार की गई ढोलक में लकड़ी की गुणवत्ता, आकार और आवाज को जरूरत के अनुसार बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकता है। यही कारण है कि पारंपरिक वाद्ययंत्रों के शौकीन और ढोलक की अच्छी जानकारी रखने वाले ग्राहक आज भी मशीन से बनी ढोलक की जगह हाथ से तैयार की गई ढोलक को प्राथमिकता देते हैं।

सरकारी सहयोग मिले तो गौला की ढोलक बन सकती है नई पहचान,
गौला में झगेकर परिवार द्वारा तैयार की जा रही ढोलक केवल एक परिवार के रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की पारंपरिक कला और ग्रामीण कारीगरी की पहचान भी है। यदि शासन-प्रशासन द्वारा ऐसे पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक सहायता, कच्चा माल उपलब्ध कराने, प्रशिक्षण देने और उनके उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए जाएं तो इस कला को व्यापक स्तर पर पहचान मिल सकती है। ऑनलाइन बाजार और पर्यटन से भी इस पारंपरिक उत्पाद को जोड़ा जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को भी इस हुनर से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
हुनर को चाहिए सिर्फ सही मंच और सहयोग,
मशीनों के बढ़ते दौर में भी अपने हाथों से ढोलक तैयार कर झगेकर परिवार ने यह साबित किया है कि पारंपरिक हुनर आज भी लोगों की पसंद बना हुआ है। जरूरत है तो सिर्फ इसे संरक्षण, प्रोत्साहन और उचित बाजार उपलब्ध कराने की। गौला की गलियों में हाथों से आकार लेती ढोलकें केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मेहनत, कला और विरासत की कहानी बयां करती हैं। यदि इस कला को समय रहते संरक्षण और प्रोत्साहन मिला तो आने वाले समय में गौला की ढोलक मुलताई की एक विशिष्ट पहचान बन सकती है।

