ग्रामीण विकास के नाम पर करोड़ों खर्च, फिर भी मुख्य मार्ग से नहीं जुड़ पाया गांव; दलदल में तब्दील सलाईढ़ाना-कोडर मार्ग से स्कूली बच्चों और मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी,
मुलताई। ग्रामीण विकास के नाम पर सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन मुलताई क्षेत्र के कई गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। इसका उदाहरण ग्राम पंचायत बोरगांव-शेरगढ़ के सम्मिलित गांव सलाईढ़ाना में देखने को मिल रहा है। वर्धा नदी के तट पर बसे इस गांव के ग्रामीणों को आजादी के 79 वर्ष बाद भी बेहतर सड़क सुविधा नहीं मिल पाई है। सलाईढ़ाना से कोडर तक लगभग 400 मीटर का मार्ग बारिश के दिनों में दलदल में तब्दील हो जाता है।
इसके चलते ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा सहित रोजमर्रा की जरूरतों के लिए आवागमन में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों के अनुसार सलाईढ़ाना से कोडर और आगे कोडर से चीचंडा होते हुए फोरलेन तक पहुंचने का मार्ग है। चीचंडा मुख्य मार्ग और फोरलेन से जुड़ा हुआ गांव है, लेकिन सलाईढ़ाना से मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को करीब साढ़े तीन किलोमीटर का कठिन सफर तय करना पड़ता है। खासकर बारिश के मौसम में यह दूरी ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।
400 मीटर का दलदली रास्ता बना सबसे बड़ी बाधा,
ग्रामीणों का कहना है कि सलाईढ़ाना से कोडर के बीच करीब 300 से 400 मीटर का रास्ता लंबे समय से खराब है। बारिश के दौरान यहां कीचड़ और दलदल इतना बढ़ जाता है कि दोपहिया और चारपहिया वाहन चलाना तो दूर, पैदल निकलना भी मुश्किल हो जाता है। इसी मार्ग से ग्रामीणों को कोडर और आगे चीचंडा पहुंचना पड़ता है। गांव में केवल प्राथमिक विद्यालय होने के कारण बच्चों को मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए प्रतिदिन कोडर जाना पड़ता है। वहीं हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों को चीचंडा तक पहुंचना पड़ता है। बारिश के दिनों में दलदली रास्ते के कारण बच्चों की सुरक्षा और उनकी नियमित पढ़ाई दोनों प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है।

स्वास्थ्य सुविधा के लिए भी रास्ता बन जाता है अभिशाप,
वर्षा ऋतु शुरू होते ही उनकी परेशानी बढ़ जाती है। रोजमर्रा के सामान से लेकर स्कूल, बाजार और अन्य जरूरी कार्यों के लिए ग्रामीणों को इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है। सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब किसी ग्रामीण को अचानक स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो जाए। खराब और दलदली रास्ते के कारण मरीज को समय पर अस्पताल तक पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। सलाईढ़ाना निवासी नरेश पवार, उदल बरखाड़े, धनराज पवार, अशोक पवार और चंदन बड़खड़े का कहना है कि गांव के लोगों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी शहर अथवा आसपास के बड़े गांवों का रुख करना पड़ता है। सड़क की स्थिति खराब होने के कारण बारिश के दिनों में आवागमन अत्यंत कठिन हो जाता है।

अनियमितताओं की भेंट चढ़ गया 87 लाख का कोडर-चीचंडा मार्ग,
ग्रामीणों ने कोडर से चीचंडा तक बने मार्ग की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार आरईएस विभाग द्वारा वर्ष 2025 में करीब 87 लाख रुपये की लागत से लगभग तीन किलोमीटर लंबे कोडर-चीचंडा मार्ग का निर्माण कराया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण के दौरान ही मार्ग की गुणवत्ता और पुलिया निर्माण को लेकर सवाल उठने लगे थे। ग्रामीणों ने निर्माण कार्य में कथित अनियमितताओं और घटिया पुलिया निर्माण की शिकायत जनप्रतिनिधियों एवं संबंधित अधिकारियों से की थी, लेकिन उनके अनुसार शिकायतों के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।

अब निर्माण को एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ है और सड़क की स्थिति खराब होने लगी है। ग्रामीणों के मुताबिक मार्ग पर जगह-जगह गड्ढे दिखाई दे रहे हैं, जो निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब मुख्य मार्ग के निर्माण में लाखों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद सड़क की स्थिति इतनी जल्दी खराब हो रही है तो ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की निगरानी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
सलाईढ़ाना-कोडर मार्ग निर्माण की मांग,
ग्राम निवासी हरिराम भलावी, राजू कोकोड़े, ओझन कोकोड़े, गुड्डू महाजन, सुनील बुवाड़े, विजय बुवाड़े, भांगी बेले, लोकेश साहू और श्रीराम बेले सहित अन्य ग्रामीणों ने सलाईढ़ाना से कोडर तक सड़क निर्माण की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सलाईढ़ाना से कोडर तक सड़क का निर्माण हो जाए तो कम से कम ग्रामीणों को कोडर तक पहुंचने में सुविधा मिल सकेगी। इससे विशेष रूप से स्कूली बच्चों को राहत मिलेगी, जो प्रतिदिन कोडर में मिडिल स्कूल और चीचंडा में हाईस्कूल जाने के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। ग्रामीणों ने संबंधित विभाग और प्रशासन से मांग की है कि सलाईढ़ाना-कोडर मार्ग की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कराकर जल्द सड़क निर्माण कराया जाए। साथ ही कोडर-चीचंडा मार्ग के निर्माण की गुणवत्ता की भी जांच कराई जाए, ताकि ग्रामीणों को सड़क सुविधा का वास्तविक लाभ मिल सके और सरकारी राशि का उपयोग टिकाऊ विकास कार्यों में हो।

