अस्तित्व की खोज में आंसू बहाता शेरगढ़ किला,

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मुलताई नगर से लगभग 8 किलोमीटर दूर ग्राम शेरगढ़ के समीप वर्धा नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक शेरगढ़ किला आज संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता नजर आ रहा है। कभी क्षेत्र के गौरव और इतिहास का साक्षी रहा यह किला अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। किले की दीवारें जगह-जगह ढह रही हैं और पूरे परिसर में झाड़ियों का कब्जा है।

वहीं, किले में कथित रूप से छिपे खजाने या सोने की अफवाह के चलते असामाजिक तत्वों द्वारा की गई जगह-जगह खुदाई से इसकी नींव और संरचना को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है। समय की मार ने भले ही इस ऐतिहासिक धरोहर की चमक फीकी कर दी हो, लेकिन किले का विशाल मुख्य द्वार आज भी इसकी भव्यता की कहानी कहता है। ऊंचे स्थान पर स्थित यह द्वार मानो आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस क्षेत्र में किले के अवशेष और वर्धा नदी का मनोहारी दृश्य पर्यटकों को आकर्षित करने की पर्याप्त क्षमता रखते हैं।

शेरगढ़ किले का मुख्य द्वार और परकोटा बड़े-बड़े पत्थरों को तराशकर बनाया गया है। किले में घोड़ों के लिए बनाए गए अस्तबल में ईंटों का भी इस्तेमाल दिखाई देता है। समय के साथ किले का अधिकांश हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है, लेकिन मुख्य द्वार, परकोटे के कुछ हिस्से और अस्तबल के कई कमरे अब भी अपेक्षाकृत सुरक्षित नजर आते हैं।

किले के भीतर एक प्राचीन बावड़ी भी मौजूद है, जो आज भी दिखाई देती है। इसके अलावा किले से जुड़ी एक लंबी सुरंग का मुहाना भी नजर आता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस सुरंग का उपयोग आपात स्थिति में किले से बाहर निकलने के लिए किया जाता रहा होगा। हालांकि सुरंग के वास्तविक उपयोग और निर्माण काल को लेकर ऐतिहासिक प्रमाणों की आवश्यकता है। किले की स्थापत्य कला भी अपने आप में आकर्षण का केंद्र है। एक ही पत्थर को काटकर मेहराबनुमा आकार में बनाए गए द्वार और चौखट तत्कालीन कारीगरी की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। कई स्थानों पर दीवारें पूरी तरह ढह चुकी हैं और अब केवल पत्थरों की चौखटें ही दिखाई देती हैं, लेकिन इन अवशेषों में भी किले की प्राचीन भव्यता की झलक साफ दिखाई देती है।

शेरगढ़ किले का इतिहास आज भी रहस्य और शोध का विषय बना हुआ है। किले के निर्माण का वास्तविक उद्देश्य, निर्माण काल और तत्कालीन शासक से संबंधित प्रमाणिक जानकारी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं है। बरार क्षेत्र और मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद इस क्षेत्र के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र से जुड़ गया, जिसके कारण स्थानीय ऐतिहासिक धरोहरों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और शोध की कमी महसूस होती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार शेरगढ़ किला शेर खान नामक किसी सरदार से संबंधित रहा है,

जो इस क्षेत्र में चौथ वसूली करता था। किले के नीचे शेर खान नामक सरदार की एक समाधि भी बताई जाती है। इसकी संरचना मुगलकालीन समाधियों से मिलती-जुलती दिखाई देती है। वर्तमान में यह स्थान धार्मिक आस्था का केंद्र भी है, जहां एक मंदिर में लोग पूजा-अर्चना कर मनोकामना मांगते हैं। हालांकि किले के निर्माण और शेर खान से इसके संबंध को लेकर स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन इन दावों की पुष्टि के लिए विस्तृत पुरातात्विक और ऐतिहासिक शोध आवश्यक है।

डॉ. कृष्ण लाल हंस द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक विश्लेषण में भी शेरगढ़ क्षेत्र से जुड़े संदर्भ का उल्लेख मिलता है। पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 12 पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1739 में मुलताई तहसील के समृद्ध गांवों से शेर शाह नामक सरदार कर वसूला करता था। उल्लेख के अनुसार उसके पुत्र ने क्षेत्र में इतना आतंक फैला रखा था कि नागपुर के भोंसले शासकों को उसके दमन के लिए सेना भेजनी पड़ी थी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वर्तमान में वीरान पड़ा शेरगढ़ किला इसी ऐतिहासिक घटना अथवा शेर शाह से संबंधित था या नहीं। किले की वास्तविक पहचान और इतिहास को प्रमाणित करने के लिए पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं द्वारा विस्तृत अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।

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