असलम अहमद
संरक्षण के अभाव में मिटते जा रहे ऐतिहासिक अवशेष,पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की जरूरत,
मुलताई नगर से लगभग 8 किलोमीटर दूर ग्राम शेरगढ़ के समीप वर्धा नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक शेरगढ़ किला आज संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता नजर आ रहा है। कभी क्षेत्र के गौरव और इतिहास का साक्षी रहा यह किला अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। किले की दीवारें जगह-जगह ढह रही हैं और पूरे परिसर में झाड़ियों का कब्जा है।

वहीं, किले में कथित रूप से छिपे खजाने या सोने की अफवाह के चलते असामाजिक तत्वों द्वारा की गई जगह-जगह खुदाई से इसकी नींव और संरचना को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है। समय की मार ने भले ही इस ऐतिहासिक धरोहर की चमक फीकी कर दी हो, लेकिन किले का विशाल मुख्य द्वार आज भी इसकी भव्यता की कहानी कहता है। ऊंचे स्थान पर स्थित यह द्वार मानो आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस क्षेत्र में किले के अवशेष और वर्धा नदी का मनोहारी दृश्य पर्यटकों को आकर्षित करने की पर्याप्त क्षमता रखते हैं।
पत्थरों से बनी भव्य संरचना आज भी आकर्षण का केंद्र,
शेरगढ़ किले का मुख्य द्वार और परकोटा बड़े-बड़े पत्थरों को तराशकर बनाया गया है। किले में घोड़ों के लिए बनाए गए अस्तबल में ईंटों का भी इस्तेमाल दिखाई देता है। समय के साथ किले का अधिकांश हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है, लेकिन मुख्य द्वार, परकोटे के कुछ हिस्से और अस्तबल के कई कमरे अब भी अपेक्षाकृत सुरक्षित नजर आते हैं।

किले के भीतर एक प्राचीन बावड़ी भी मौजूद है, जो आज भी दिखाई देती है। इसके अलावा किले से जुड़ी एक लंबी सुरंग का मुहाना भी नजर आता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस सुरंग का उपयोग आपात स्थिति में किले से बाहर निकलने के लिए किया जाता रहा होगा। हालांकि सुरंग के वास्तविक उपयोग और निर्माण काल को लेकर ऐतिहासिक प्रमाणों की आवश्यकता है। किले की स्थापत्य कला भी अपने आप में आकर्षण का केंद्र है। एक ही पत्थर को काटकर मेहराबनुमा आकार में बनाए गए द्वार और चौखट तत्कालीन कारीगरी की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। कई स्थानों पर दीवारें पूरी तरह ढह चुकी हैं और अब केवल पत्थरों की चौखटें ही दिखाई देती हैं, लेकिन इन अवशेषों में भी किले की प्राचीन भव्यता की झलक साफ दिखाई देती है।

आज भी पहेली बना हुआ है शेरगढ़ किले का इतिहास,
शेरगढ़ किले का इतिहास आज भी रहस्य और शोध का विषय बना हुआ है। किले के निर्माण का वास्तविक उद्देश्य, निर्माण काल और तत्कालीन शासक से संबंधित प्रमाणिक जानकारी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं है। बरार क्षेत्र और मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद इस क्षेत्र के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र से जुड़ गया, जिसके कारण स्थानीय ऐतिहासिक धरोहरों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और शोध की कमी महसूस होती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार शेरगढ़ किला शेर खान नामक किसी सरदार से संबंधित रहा है,
जो इस क्षेत्र में चौथ वसूली करता था। किले के नीचे शेर खान नामक सरदार की एक समाधि भी बताई जाती है। इसकी संरचना मुगलकालीन समाधियों से मिलती-जुलती दिखाई देती है। वर्तमान में यह स्थान धार्मिक आस्था का केंद्र भी है, जहां एक मंदिर में लोग पूजा-अर्चना कर मनोकामना मांगते हैं। हालांकि किले के निर्माण और शेर खान से इसके संबंध को लेकर स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन इन दावों की पुष्टि के लिए विस्तृत पुरातात्विक और ऐतिहासिक शोध आवश्यक है।

ऐतिहासिक संदर्भ में मिलता है शेर शाह का उल्लेख,
डॉ. कृष्ण लाल हंस द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक विश्लेषण में भी शेरगढ़ क्षेत्र से जुड़े संदर्भ का उल्लेख मिलता है। पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 12 पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1739 में मुलताई तहसील के समृद्ध गांवों से शेर शाह नामक सरदार कर वसूला करता था। उल्लेख के अनुसार उसके पुत्र ने क्षेत्र में इतना आतंक फैला रखा था कि नागपुर के भोंसले शासकों को उसके दमन के लिए सेना भेजनी पड़ी थी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वर्तमान में वीरान पड़ा शेरगढ़ किला इसी ऐतिहासिक घटना अथवा शेर शाह से संबंधित था या नहीं। किले की वास्तविक पहचान और इतिहास को प्रमाणित करने के लिए पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं द्वारा विस्तृत अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।

संरक्षण नहीं हुआ तो मिट जाएगा इतिहास,
शेरगढ़ किले की वर्तमान स्थिति चिंता पैदा करने वाली है। दीवारों के ढहने, झाड़ियों के बढ़ने और जगह-जगह की गई खुदाई के कारण किले के बचे हुए अवशेष भी धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं। यदि समय रहते इसके संरक्षण की पहल नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक धरोहर को केवल तस्वीरों और किस्सों में ही देख पाएंगी। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि किले का सर्वेक्षण कर इसकी ऐतिहासिकता निर्धारित की जानी चाहिए। साथ ही परिसर की साफ-सफाई, अवैध खुदाई पर रोक, क्षतिग्रस्त हिस्सों का संरक्षण और किले तक पहुंचने के लिए आवश्यक सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए।

पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है शेरगढ़,
मुलताई और आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक एवं धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मां ताप्ती की पवित्र नगरी होने के कारण वर्षभर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुलताई पहुंचते हैं। ऐसे में शेरगढ़ किले को भी पर्यटन सर्किट से जोड़कर क्षेत्र में पर्यटन की नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। किले के प्राचीन अवशेषों को संरक्षित करते हुए यहां व्यू-पॉइंट, पाथवे, प्रकाश व्यवस्था, सूचना बोर्ड और आवश्यक पर्यटक सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण भी होगा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

किले से दिखाई देगा वर्धा बांध का मनोहारी दृश्य,
वर्धा नदी पर सिंचाई परियोजना के तहत बांध का निर्माण होने के बाद शेरगढ़ किले की पर्यटन संभावनाएं और बढ़ सकती हैं। किला ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां से वर्धा बांध और आसपास की प्राकृतिक वादियों का मनोरम दृश्य दिखाई दे सकता है। यदि संबंधित विभाग किले के संरक्षण और विकास की दिशा में पहल करता है तो यह स्थान इतिहास, प्रकृति और पर्यटन का अनूठा संगम बन सकता है। सामान्यतः बांध और सिंचाई परियोजनाओं के आसपास पर्यटक सुविधाएं विकसित की जाती हैं। ऐसे में शेरगढ़ किले को भी इस पर्यटन योजना से जोड़कर विकसित करने पर क्षेत्र को एक नया पर्यटन केंद्र मिल सकता है।

इतिहास बचाने के लिए पहल जरूरी,
शेरगढ़ किला भले ही आज खंडहर में बदलता जा रहा हो, लेकिन इसके पत्थरों में मुलताई और आसपास के क्षेत्र के अतीत की कहानी छिपी हुई है। आवश्यकता इस बात की है कि इस धरोहर को केवल खंडहर समझकर छोड़ने के बजाय इसके इतिहास की वैज्ञानिक जांच कराई जाए और पुरातात्विक महत्व के अवशेषों को संरक्षित किया जाए। यदि प्रशासन, पुरातत्व विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधि मिलकर पहल करें तो शेरगढ़ को न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में बचाया जा सकता है, बल्कि इसे मुलताई के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी शामिल किया जा सकता है।
इनका कहना,
हा यह सही है की शेरगढ़ किले की स्थिति समय के साथ खराब हो रही है। किले को विकसित कर सुंदर पर्यटन स्थल के रूप में तैयार किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए पर्यटन विभाग द्वारा पहल किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जल संसाधन विभाग के पास किले के संरक्षण और पर्यटन विकास के लिए अलग से बजट उपलब्ध नहीं होता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जिला कलेक्टर ने भी शेरगढ़ किले का दौरा किया था। किले के संरक्षण और विकास की दिशा में प्रशासन एवं पर्यटन विभाग द्वारा पहल की जाती है,
— शिवकुमार नागले, एसडीओ, जल संसाधन विभाग


