तीन साल की कानूनी जंग के बाद नीतू परमार ने संभाली मुलताई नगर पालिका की कमान,

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मुलताई। नगर पालिका अध्यक्ष पद को लेकर लगभग साढ़े तीन वर्षों तक चली लंबी कानूनी जंग का आखिरकार पटाक्षेप हो गया। स्थानीय न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चले इस बहुचर्चित मामले में हाईकोर्ट के फैसले के पालन में नीतू प्रहलाद परमार ने आज नगर पालिका अध्यक्ष का पदभार विधिवत ग्रहण कर लिया।

मुख्य नगर पालिका अधिकारी वीरेंद्र तिवारी ने उन्हें औपचारिक रूप से पदभार सौंपा। इस अवसर पर नगर पालिका परिषद के सभा कक्ष में आयोजित समारोह में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, कांग्रेस पदाधिकारी, पार्षद और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

पदभार ग्रहण करने के बाद नीतू परमार ने पूर्व मंत्री सुखदेव पांसे, सहयोगी पार्षदों, कांग्रेस पदाधिकारियों एवं समर्थकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा— “यह जीत केवल मेरी नहीं, बल्कि मां ताप्ती और खाटू श्याम के आशीर्वाद तथा आप सभी के सहयोग का परिणाम है। मेरा प्रयास रहेगा कि मां ताप्ती की इस पवित्र नगरी में विकास का नया अध्याय शुरू किया जाए।” समारोह में पूर्व विधायक पी.आर. बोड़खे, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष अरुण यादव, नगर कांग्रेस अध्यक्ष सुमित शिवहरे, कमल सोनी, अंजलि शिवहरे, साजिदा जाकिर, निर्मला उबनारे, सुरेश पौनीकर, नगर पालिका उपाध्यक्ष शिवकुमार माहोरे सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और नागरिकों ने पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई दी।

पांच बार बदला अध्यक्ष पद, अनोखा राजनीतिक घटनाक्रम -मुलताई नगर पालिका का बीता साढ़े तीन वर्षों का कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता और विवादों के लिए याद किया जाएगा। इस दौरान अध्यक्ष पद पर कई बार बदलाव हुए, जिसने इसे एक अनोखा और चर्चित मामला बना दिया। नीतू परमार ने तीन बार अध्यक्ष पद संभाला एक बार चुनाव में 9 वोट प्राप्त कर दो बार न्यायालय के आदेश से वहीं वर्षा गड़ेकर को शासन द्वारा दो बार अध्यक्ष नियुक्त किया गया इस तरह कुल मिलाकर साढ़े तीन वर्षों में पांच बार अध्यक्ष पदभार ग्रहण हुआ, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड जैसा घटनाक्रम रहा।

अस्थिर परिषद का असर: विकास पर पड़ा व्यापक प्रभाव राजनीतिक खींचतान में जनता को उठाना पड़ा नुकसान -नगर परिषद की अस्थिरता का असर सीधे तौर पर शहर के विकास पर देखने को मिला। हालांकि कुछ लोगों को छोड़ दें तो राजनीतिक उठापटक का व्यक्तिगत स्तर पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन नगर की जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। कई निर्माण कार्य अधूरे या प्रभावित रहे गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे, लेकिन ठोस निगरानी का अभाव रहा आर्थिक सुधार और योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान नहीं दिया जा सका प्रशासनिक स्तर पर भी निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई मुलताई में अक्सर “सुविधा और संबंधों की राजनीति” हावी रहने की बात कही जाती है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक अस्थिरता का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को ही उठाना पड़ता है। नई जिम्मेदारी, बड़ी चुनौती अब जबकि नीतू परमार ने पुनः अध्यक्ष पद संभाल लिया है, उनके सामने अगले 14 महीनों में नगर परिषद को स्थिरता देना और विकास कार्यों को गति देना सबसे बड़ी चुनौती होगी। नगरवासियों को उम्मीद है कि लंबे विवाद के बाद अब मुलताई में विकास, पारदर्शिता और सुशासन का नया दौर शुरू होगा।
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