असलम अहमद
बशीर बद्र सरल शब्दों में गहरी बातें कहने वाले शायर ने अदब को ऐसी विरासत दी, जो पीढ़ियों तक इंसानियत, मोहब्बत और रिश्तों का पाठ पढ़ाती रहेगी,Bashir Badr कहते है।”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
सिर्फ दो पंक्तियों में इंसानी दर्द, सामाजिक संवेदना और सभ्यता की पूरी कहानी कह देने वाले हिंदी-उर्दू अदब के महान शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। पद्मश्री से सम्मानित बशीर बद्र का निधन केवल एक शायर का जाना नहीं है, बल्कि शब्दों की उस दुनिया का मौन हो जाना है, जिसने दशकों तक लोगों के दिलों को जोड़े रखा।
हिंदी-उर्दू अदब के इस महान शिल्पी को हम इंडिया टीम की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।— असलम अहमद
बशीर बद्र उन विरले शायरों में थे जिन्होंने उर्दू शायरी को आम आदमी की जुबान और उसके जज्बातों से जोड़ा। उनकी शायरी में न तो कठिन शब्दों का बोझ था और न ही विचारों की जटिलता, लेकिन उनकी हर पंक्ति सीधे दिल में उतर जाती थी। यही कारण है कि उनके शेर केवल मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि घर-घर, गली-मोहल्लों, राजनीतिक मंचों और सामाजिक चर्चाओं तक पहुंचे।

उनकी शायरी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापकता थी। उन्होंने किसी विशेष घटना या परिस्थिति को आधार बनाकर शेर कहे होंगे, लेकिन उनके शब्द समय और संदर्भ की सीमाओं को पार कर जाते थे। यही वजह है कि उनके अनेक शेर आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं जितने दशकों पहले थे। भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के संदर्भ में उनका यह मशहूर शेर आज भी कूटनीति और मानवीय संबंधों का सबसे सुंदर संदेश माना जाता है—“दुश्मनी जम के करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”
यह शेर केवल दो देशों के संबंधों पर ही नहीं, बल्कि जीवन के हर रिश्ते पर लागू होता है। मतभेद हो सकते हैं, विरोध हो सकता है, लेकिन संवाद और सम्मान का दरवाजा कभी बंद नहीं होना चाहिए।

सांप्रदायिक दंगों और आगजनी की घटनाओं से व्यथित होकर उन्होंने इंसानियत की पीड़ा को जिस तरह शब्द दिए, वह आज भी समाज को आईना दिखाते हैं—“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
इन पंक्तियों में केवल घरों के जलने का दर्द नहीं है, बल्कि उस मेहनत, सपनों और रिश्तों के उजड़ने की पीड़ा भी छिपी है, जिसे कोई संवेदनशील मनुष्य महसूस कर सकता है।

मोहब्बत के शायर कहे जाने वाले बशीर बद्र ने जीवन के लगभग हर पहलू पर लिखा। उन्होंने प्रेम, बिछड़न, सफलता, असफलता, अहंकार, संघर्ष और मानवीय रिश्तों को बेहद सादगी से अभिव्यक्त किया। शोहरत की क्षणभंगुरता पर उनका यह शेर आज भी उतना ही सच है—
“शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।”
विरोध और आलोचना को भी उन्होंने सकारात्मक दृष्टि से देखा। उनका यह शेर जीवन में आत्ममंथन का संदेश देता है—
“मुखालिफत से मेरी शख्सियत संवरती है, मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूं।”

बदलते सामाजिक व्यवहार और रिश्तों में बढ़ती दूरियों पर उन्होंने लिखा—
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।”
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के निकट स्थित एक गांव में हुआ था। बाद में उनका परिवार इटावा आ गया, जहां उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। साहित्य और उर्दू अदब में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 28 मई 2026 को भोपाल में 91 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली।

उनके जाने के बाद उर्दू अदब का एक स्वर्णिम अध्याय अवश्य समाप्त हुआ है, लेकिन उनकी शायरी हमेशा जीवित रहेगी। जब भी इंसानियत की बात होगी, जब भी मोहब्बत की चर्चा होगी, जब भी रिश्तों में दरार और उन्हें जोड़ने की कोशिशों का जिक्र होगा, तब बशीर बद्र के शब्द लोगों के होंठों पर होंगे। शायद इसी कारण अपने मुशायरों के अंत में वह अक्सर यह शेर पढ़ा करते थे—
“मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।”
आज बशीर बद्र इस दुनिया की महफिल से उठकर चले गए हैं, लेकिन उनकी शायरी के रूप में वह हमेशा हमारे बीच मौजूद रहेंगे। उनके शब्द आने वाली पीढ़ियों को मोहब्बत, इंसानियत और तहजीब का रास्ता दिखाते रहेंगे।
हिंदी-उर्दू अदब के इस महान शिल्पी को हम इंडिया टीम की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।— असलम अहमद


