हर योजना अधूरी, हर बार नया बजट… कब रुकेगा यह खेल.?

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मुलताई। पवित्र नगरी मुलताई में विकास कार्यों की स्थिति लगातार सवालों के घेरे में है। नगरवासियों को विकास के बड़े-बड़े सपने दिखाकर शुरू की जाने वाली महत्वाकांक्षी परियोजनाएं वर्षों तक अधूरी पड़ी रहती हैं। इस दौरान जनप्रतिनिधि और अधिकारी समय-समय पर परियोजनाओं की समय-सीमा बढ़ाते रहते हैं, ठेकेदारों को भुगतान भी होता रहता है, लेकिन जब योजना की राशि समाप्त हो जाती है तो यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाता है कि मूल डीपीआर (विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन) अधूरी थी, इसलिए कार्य पूरा करने के लिए नई पूरक योजना (सप्लीमेंट्री डीपीआर) बनानी पड़ेगी।

बीते कुछ वर्षों में नगर की चार प्रमुख विकास परियोजनाएं अधूरी रह गईं। इन्हें पूरा करने के लिए अब लगभग 12 करोड़ रुपये से अधिक की नई पूरक योजनाएं तैयार की गई हैं। इनमें हरदौली जलावर्धन योजना के पीएचई (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी) घटक के लिए अमृत 2.0 योजना के तहत लगभग 7 करोड़ रुपये की पूरक योजना पर कार्य जारी है। इसके अलावा हरदौली बांध के बेस्ट वेयर एवं ओवर नदी कंक्रीट निर्माण के लिए लगभग 3 करोड़ रुपये, सीवर लाइन बिछाने के दौरान क्षतिग्रस्त हुई सड़कों के पुनर्निर्माण के लिए करीब 80 लाख रुपये का पुनरीक्षित (री-एस्टीमेट) तैयार किया गया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीवर लाइन परियोजना में सड़कों की मरम्मत और पुनर्निर्माण पहले से ही शामिल था। इसके बावजूद उन्हीं सड़कों के सुधार के लिए लगभग 80 लाख रुपये का नया एस्टीमेट तैयार किया गया है यह खाकर की सीवर लाइन डीपीआर में एम 20 की सड़को का सुधार कार्य शामिल था जबकि तोड़ी गई सड़क सड़क एम 40 रेसो की है 25 किलोमीटर सड़के टूटी नगर पालिका का परिसर खाई में बदल गया 5 करोड रुपए खर्च हो गए और अब तक मामले की ना तो जांच हुई और ना ही जवाबदारी तय हुई। इससे परियोजनाओं की गुणवत्ता और वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

हाल ही में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से सूर्यनारायण सरोवर का निर्माण कराया गया। अब जानकारी सामने आ रही है कि मूल एस्टीमेट में सरोवर के लिए आवश्यक बेस्ट वेयर का प्रावधान ही नहीं किया गया था। इसके निर्माण के लिए अब 9 लाख रुपये का अतिरिक्त एस्टीमेट बनाकर शासन को मंजूरी के लिए भेजा गया है। यदि यह दावा सही है तो सवाल उठता है कि लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई डीपीआर में इतनी महत्वपूर्ण संरचना को कैसे छोड़ दिया गया? और यदि यह तकनीकी लापरवाही है तो डीपीआर तैयार करने वाली एजेंसियों के विरुद्ध अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

फाइल फोटो

नगर पालिका प्रत्येक परियोजना के लिए लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर डीपीआर तैयार कराती है। तकनीकी अधिकारियों की नियुक्ति भी इसी उद्देश्य से की जाती है कि योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो और जनता के धन का सदुपयोग सुनिश्चित किया जा सके। नगरवासी जनप्रतिनिधियों को भी इसी विश्वास के साथ चुनते हैं कि वे विकास कार्यों की निगरानी करेंगे। इसके बावजूद यदि अधिकांश योजनाओं में राशि खर्च होने के बाद भी कार्य अधूरे रह जाते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए नई योजनाएं बनानी पड़ती हैं, तो ऐसे नुकसान के लिए जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी? एक ओर करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि अतिरिक्त योजनाओं में खर्च हो रही है, वहीं दूसरी ओर नगर पालिका हजार-दो हजार रुपये के बकाये पर गरीब उपभोक्ताओं के नल कनेक्शन काटने में पीछे नहीं रहती।

फाइल फोटो

करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से बने हरदौली बांध में बेस्ट वेयर निर्माण को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बांध में नाला क्लोजर ग्राउंड लेवल से बेस्ट वेयर की ऊंचाई लगभग 10 से15 फीट से अधिक है, जबकि उसका आधार कच्ची मुरम पर छोड़ा गया था। सामान्य तकनीकी समझ रखने वाला व्यक्ति भी यह अनुमान लगा सकता था कि इतनी ऊंचाई पर स्थित कच्चा आधार भविष्य में कटाव का कारण बन सकता है। आरोप है कि निर्माण के दौरान बीच में केवल एक पिलर डालकर कार्य पूरा मान लिया गया और बाद में लगातार मिट्टी का कटाव शुरू हो गया। ठेकेदार को भुगतान होने के बाद अधिकारियों को यह याद आया कि मूल एस्टीमेट में पक्का बेस्ट वेयर शामिल ही नहीं था। अब कटाव रोकने के लिए लगभग 3 करोड़ रुपये की नई डीपीआर बनाकर शासन को भेजी गई है।

हरदौली पेयजल परियोजना दो भागों—बांध और पीएचई घटक—में तैयार की गई थी। यह योजना आगामी 55 वर्षों की आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। बांध की जल भंडारण क्षमता 4.7 एमसीएम निर्धारित की गई, जिससे नगर को लंबे समय तक पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराया जा सके। पेयजल वितरण प्रणाली पर लगभग 12 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद नगर पालिका को यह महसूस हुआ कि मूल डीपीआर में घर-घर पाइपलाइन पहुंचाने का प्रावधान ही नहीं था।

इसके बाद अमृत 2.0 के तहत लगभग 7 करोड़ रुपये की नई योजना स्वीकृत हुई, जिसका लगभग 70 प्रतिशत कार्य पूरा होना बताया जा रहा है। हालांकि यहां भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। नगर पालिका पिछले कई वर्षों से पाइपलाइन बदलने और नई पाइपलाइन बिछाने का भुगतान करती रही है। यदि लगातार पाइपलाइन बदली जा रही है तो फिर आज भी बड़ी संख्या में लोग जर्जर पाइपलाइन से दूषित पेयजल पीने को मजबूर क्यों हैं? भुगतान से पहले कार्यों का भौतिक सत्यापन क्यों नहीं किया गया?

महेश शर्मा, उपयंत्री, नगर पालिका मुलताई

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