1.55 अरब की वर्धा सिंचाई परियोजना बनी सफेद हाथी, किसानों के बजाय निजी कंपनी को मिल रहा है लाभ,

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मुलताई। लगभग 1 अरब 55 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित वर्धा मध्य उद्वहन (लिफ्ट) सिंचाई परियोजना को लेकर क्षेत्र के किसानों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। किसानों का आरोप है कि जिन किसानों के लिए यह महत्वाकांक्षी परियोजना बनाई गई थी, उन्हें आज तक इसका पूरा लाभ नहीं मिल सका है, जबकि परियोजना का पानी निजी क्षेत्र की एक ब्लूबेरी कंपनी को उपलब्ध कराया जा रहा है।

दूसरी ओर सिंचाई विभाग किसानों को ग्रीष्मकालीन फसल बोने पर कार्रवाई की चेतावनी दे रहा है। किसानों का कहना है कि परियोजना के प्रारंभ होने के समय उन्हें सिंचाई सुविधा, फसल उत्पादन में वृद्धि और आर्थिक समृद्धि के सपने दिखाए गए थे, लेकिन योजना शुरू होने के लगभग नौ वर्ष बाद भी वे स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। क्षेत्र के किसानों का आरोप है कि वर्धा जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना का वास्तविक लाभ आज भी किसानों तक नहीं पहुंच पाया है।

वर्धा मध्य उद्वहन सिंचाई परियोजना का मुख्य उद्देश्य शेरगढ़, सलाईढ़ाना सहित आसपास के 22 से अधिक गांवों के किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना तथा रबी एवं ग्रीष्मकालीन फसलों के रकबे में वृद्धि करना था। किसानों का कहना है कि परियोजना पर अरबो रुपये खर्च किए जाने के बावजूद इसका लाभ अपेक्षित स्तर पर नहीं मिल रहा है और अधिकांश किसान आज भी पर्याप्त सिंचाई सुविधा से वंचित हैं।

वर्धा बांध के समीप स्थित सलाईढ़ाना गांव के किसान घनश्याम देशमुख, जंगली पवार, राजू कोकाटे, मारुति बेल एवं श्रीराम बेल का आरोप है कि सिंचाई विभाग के अधिकारी निजी ब्लूबेरी कंपनी पर विशेष मेहरबान हैं। किसानों के अनुसार 12 से 15 इंच व्यास की पाइपलाइन के माध्यम से बांध का पानी व्यावसायिक उपयोग के लिए कंपनी को उपलब्ध कराया जा रहा है। किसानों का दावा है कि कंपनी द्वारा प्रतिदिन कितनी मात्रा में पानी लिया जा रहा है, इसका स्पष्ट लेखा-जोखा विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि जब किसानों के हिस्से का पानी निजी उपयोग के लिए दिया जा रहा है, तब किसानों को सिंचाई से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।

सलाईढ़ाना निवासी गुड्डू महाजन, लाल जी साहू का कहना है कि सिंचाई विभाग द्वारा गांवों में मुनादी कराकर किसानों को गर्मी की फसल नहीं बोने की चेतावनी दी गई। किसानों को बताया गया कि यदि किसी ने ग्रीष्मकालीन फसल के लिए सिंचाई की तो उसकी मोटर जब्त की जा सकती है तथा सिंचाई विभाग और बिजली विभाग संयुक्त रूप से कार्रवाई करेंगे। किसानों का आरोप है कि एक ओर उन्हें खेती के लिए पानी उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर निजी कंपनी को पानी दिया जा रहा है, जिससे किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

किसानों का आरोप है कि सिंचाई विभाग में वर्षों से पदस्थ अधिकारियों की कार्यप्रणाली तथा परियोजना के क्रियान्वयन में हुई देरी के कारण ही आज तक योजना का लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाया है। उनका कहना है कि परियोजना के निर्माण में हुई देरी, ठेकेदारों को बार-बार दी गई समय-वृद्धि तथा करोड़ों रुपये की लागत के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। किसानों ने मांग की है कि परियोजना से जुड़े सभी पहलुओं, अधिकारियों की कार्यप्रणाली, खर्च की गई राशि तथा निर्माण कार्य में हुई देरी के कारणों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और किसानों को उनके अधिकार का पानी एवं सिंचाई सुविधा मिल सके।

क्षेत्र के किसानों का कहना है कि वर्धा मध्य उद्वहन सिंचाई परियोजना उनके लिए विकास और समृद्धि का माध्यम बन सकती थी, लेकिन वर्षों बाद भी इसके अधूरे लाभ ने उनकी उम्मीदों को झटका दिया है। किसानों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि परियोजना का उद्देश्य पूरा करते हुए प्राथमिकता के आधार पर किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाए तथा किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

इनका कहना

वर्धा सिंचाई परियोजना में ऐसा कोई कार्य शेष नहीं है। जहां तक ब्लूबेरी कंपनी को पानी देने का सवाल है, पहले आरोप लगाने वाले किसानों से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने पानी उपयोग का शुल्क नियमित रूप से जमा किया है या नहीं। ऑब्जेक्शन तो सभी लोग लगाते  हैं, लेकिन  किसानों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने पानी का पैसा भरा है या नहीं। मामले को एकतरफा दृष्टिकोण से न देखें।
सी.एल. मरकाम
कार्यपालन यंत्री, जल संसाधन विभाग, मुलताई


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