परिसीमन के साथ बदलती रही मुलताई विधानसभा की सीमाएं,पुराने नक्शों ने खोला राजनीतिक भूगोल का इतिहास,

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वर्तमान की मुलताई विधानसभा पहले की तुलना में काफी अलग स्वरूप ले चुकी है। स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक विधानसभा सीमांकन में मुलताई क्षेत्र अपेक्षाकृत विस्तृत माना जाता था। उस समय पूरी मुलताई तहसील के साथ कई सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्र भी इसी विधानसभा में शामिल थे। पुराने नक्शों के अनुसार ताप्ती नदी क्षेत्र, महाराष्ट्र सीमा से लगे गांव तथा नागपुर रोड बेल्ट का बड़ा हिस्सा एक ही राजनीतिक इकाई के रूप में देखा जाता था। उस दौर में विधानसभा की सीमाएं मुख्य रूप से तहसील, राजस्व गांव, सड़क संपर्क और जनसंख्या के आधार पर निर्धारित की जाती थीं

1971 की जनगणना के बाद हुए परिसीमन में मुलताई विधानसभा के स्वरूप में बड़ा परिवर्तन शुरू हुआ। वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व विधायक डॉ. पंजाबराव बोड़खे के अनुसार, वर्ष 1972 में यह क्षेत्र मुलताई-आमला विधानसभा के नाम से जाना जाता था। उस चुनाव में आमला क्षेत्र विधानसभा का हिस्सा था और निर्दलीय प्रत्याशी राधाकृष्ण गर्ग विजयी हुए थे। वहीं, मुलताई से लगी दूसरी विधानसभा पट्टन-दुनावा विधानसभा कहलाती थी, जहां कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र पटेल चुनाव मैदान में थे, लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी रामजी महाजन ने जीत दर्ज की थी।

डॉ. बोड़खे बताते हैं कि वर्ष 1977 के परिसीमन के बाद विधानसभा की सीमाओं में व्यापक बदलाव हुआ और मुलताई-आमला विधानसभा का स्वरूप बदलकर मुलताई-दुनावा विधानसभा बन गया। 1972 में निर्दलीय विधायक बने राधाकृष्ण गर्ग को 1977 में कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। उस चुनाव में मनीराम बारंगे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी रहे। 2008 में फिर बदला विधानसभा का स्वरूप वर्ष 2008 के परिसीमन में एक बार फिर विधानसभा की सीमाओं का पुनर्गठन किया गया। इसके बाद विधानसभा क्षेत्र का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में आया और इसे मुलताई-प्रभात पट्टन विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 129 के रूप में नई पहचान मिली।

देश में प्रस्तावित नए परिसीमन को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। यदि जनगणना और परिसीमन आयोग की प्रक्रिया समय पर पूरी होती है तो वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव नई सीमाओं के आधार पर कराए जा सकते हैं। साथ ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने की संभावना भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नए परिसीमन का असर मुलताई विधानसभा पर भी पड़ सकता है। सीमावर्ती क्षेत्रों के पुनर्गठन अथवा विधानसभा की भौगोलिक सीमाओं में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे क्षेत्र की राजनीतिक रणनीतियां, नेतृत्व और चुनावी गणित भी बदल सकता है। विशेष तौर से बाहर रहकर भी अपने आप को मुलताई विधानसभा का हितेषी बताने वाले लोगों के अरमानों पर भी पानी फीर सकता है।

लगभग पांच दशकों से अधिक समय तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे डॉ. पंजाबराव बोड़खे का कहना है कि समय के साथ राजनीति में बदलाव स्वाभाविक है। उनके अनुसार, “हर दौर के अपने मुद्दे होते हैं। समाज बदलता है तो राजनीति भी बदलती है। पहले राजनीति में व्यक्ति के चरित्र और सामाजिक स्वीकार्यता को अधिक महत्व दिया जाता था। आज राजनीतिक शैली और चुनावी रणनीतियां बदल गई हैं।” राजनीति के अपराधीकरण को लेकर उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोकतंत्र के स्वस्थ भविष्य के लिए राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त रखना आवश्यक है। दबाव और भय की राजनीति किसी भी क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास के लिए उचित नहीं मानी जा सकती।

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