जनता के हक-अधिकारों की आवाज बना जंतर-मंतर अब नहीं रहा निर्धारित धरना स्थल,

0

नई दिल्ली। देश की जनता के हक-अधिकारों की लड़ाई, सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने और लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक रहा दिल्ली का जंतर-मंतर अब अपने ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर चर्चा में है। वर्ष 1993 से विभिन्न जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहे जंतर-मंतर को दिल्ली पुलिस ने निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया है। 12 अक्टूबर 2026 को सामने आए इस फैसले के बाद अब प्रदर्शन और धरने के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा पूर्वी दिल्ली के CBD मैदान को वैकल्पिक स्थल घोषित किया गया है। इस बदलाव ने जंतर-मंतर पर वर्षों से अपनी मांगें उठाते आ रहे संगठनों और आम नागरिकों के बीच नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

जंतर-मंतर की पहचान कभी केवल एक ऐतिहासिक खगोलीय वेधशाला तक सीमित नहीं रही। संसद और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालयों के निकट स्थित इस स्थान ने दशकों तक उन लोगों को मंच दिया, जो अपनी समस्याओं, मांगों और शिकायतों को देश के सामने रखना चाहते थे। यहां किसानों ने कर्ज और राहत की मांग उठाई, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की, महिलाओं ने न्याय और सुरक्षा की मांग की तथा खिलाड़ियों और युवाओं ने अपनी समस्याओं को लेकर प्रदर्शन किए।

जंतर-मंतर के धरना स्थल के रूप में उभरने की कहानी वर्ष 1993 से जुड़ी है। इससे पहले दिल्ली के बोट क्लब क्षेत्र में बड़े जन आंदोलन आयोजित होते थे। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हजारों किसानों का विशाल जमावड़ा हुआ था। बाद के वर्षों में बोट क्लब क्षेत्र में प्रदर्शनों पर प्रतिबंधात्मक पाबंदियां बढ़ने के बाद जंतर-मंतर धीरे-धीरे आंदोलनकारियों के लिए प्रमुख स्थल बन गया। 1990 के दशक के मध्य तक यह स्थान विभिन्न सामाजिक संगठनों, छात्र समूहों, कर्मचारी संगठनों, किसानों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के धरना-प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र बन चुका था। संसद के निकट होने के कारण यहां उठने वाली आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान मिलने की संभावना भी अधिक रहती थी।

5 अप्रैल 2011 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर जन लोकपाल कानून की मांग और भ्रष्टाचार के विरोध में अनशन शुरू किया। इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण सहित कई प्रमुख कार्यकर्ता जुड़े। देखते ही देखते यह अभियान राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। लोकपाल और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के विभिन्न हिस्सों में भी प्रदर्शन हुए। जंतर-मंतर पर हुए इस आंदोलन ने साबित किया कि एक स्थान पर शुरू हुआ शांतिपूर्ण विरोध देशव्यापी बहस का रूप ले सकता है। इसके बाद जंतर-मंतर की पहचान देश के प्रमुख जन आंदोलनों के स्थल के रूप में और मजबूत हुई।

वर्ष 2017 में तमिलनाडु के कर्जग्रस्त किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगभग 40 दिनों तक आंदोलन किया। किसानों ने सूखा राहत पैकेज, कर्ज माफी और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन जैसी मांगें उठाईं। प्रदर्शन के दौरान किसानों ने अपनी आर्थिक बदहाली और सूखे से पैदा हुए संकट की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए अनूठे और प्रतीकात्मक तरीके अपनाए। इस आंदोलन ने कृषि संकट और किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।

वर्ष 2023 में भारतीय कुश्ती जगत के कई चर्चित खिलाड़ियों ने जंतर-मंतर पर धरना दिया। ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और बजरंग पूनिया सहित पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की। यह धरना कई सप्ताह तक चला और राष्ट्रीय राजनीति, खेल प्रशासन तथा महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा का कारण बना। संबंधित आरोपों और उनके कानूनी परिणामों को अलग-अलग तथ्यों के आधार पर देखा जाना आवश्यक है।

जंतर-मंतर पर बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रिया, परीक्षा संबंधी अनियमितताओं, कर्मचारियों की मांगों और विभिन्न सामाजिक मुद्दों को लेकर भी समय-समय पर प्रदर्शन होते रहे हैं। अलग-अलग राज्यों से आए लोग अपनी समस्याओं के समाधान की मांग लेकर यहां धरना देते रहे हैं। कई आंदोलन कुछ दिनों में समाप्त हुए, जबकि कुछ ने लंबे समय तक देश का ध्यान आकर्षित किया। इन आंदोलनों का स्वरूप और परिणाम भले ही अलग-अलग रहे हों, लेकिन जंतर-मंतर लंबे समय तक अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से रखने के इच्छुक लोगों के लिए एक पहचाना हुआ स्थल बना रहा।

दिल्ली पुलिस के 12 अक्टूबर 2026 के आदेश के अनुसार, जंतर-मंतर को अब निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में सूचीबद्ध नहीं रखा गया है। इसके स्थान पर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के CBD मैदान को वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों के रूप में घोषित किया गया है। नए स्थलों पर प्रदर्शन आयोजित करने की विस्तृत प्रक्रिया और अनुमति संबंधी नियमों का पालन करना होगा। इस फैसले का अर्थ यह है कि जंतर-मंतर अब आधिकारिक रूप से निर्धारित प्रदर्शन स्थल नहीं रहेगा। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि देश में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार समाप्त हो गया है। प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन, साथ ही वैकल्पिक स्थलों की उपलब्धता और उनकी व्यावहारिक पहुंच, आने वाले समय में महत्वपूर्ण विषय रहेंगे।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि घोषित वैकल्पिक स्थलों पर प्रदर्शनकारियों को किस प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं, अनुमति की प्रक्रिया कितनी सुलभ रहती है और आम नागरिक अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए इन स्थलों का कितना प्रभावी उपयोग कर पाते हैं जंतर-मंतर का इतिहास याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज केवल किसी एक स्थान तक सीमित नहीं होती। लेकिन उस आवाज को सुनने के लिए सुलभ मंच, शांतिपूर्ण विरोध की गुंजाइश और प्रशासनिक पारदर्शिता का बने रहना भी उतना ही आवश्यक है। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here