शिवधाम में 170 मीटर ऊंची चोटी पर विराजते हैं भोलेनाथ

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मुलताई। सतपुड़ा की मनमोहक वादियों में बसा शिवधाम सालबर्डी धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य की प्रतिमा भी है। मध्य प्रदेश महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित इस धाम पर शिवरात्रि के अवसर पर लगने वाले विशाल मेले की तैयारियां पूर्ण हो गई है। जिसका बैतूल जिला कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी एवं पुलिस अधीक्षक वीरेन्द्र जैन सहित  अधिकारियों ने जायजा लीया यहां शिवरात्रि पर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से लाखों लोग भगवान भोलेनाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। शिव धाम सालबर्डी में प्रकृति अपना खजाना लुटाती प्रतीत होती है।

प्राचीन समय में पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियाँ समृद्ध वास्तुकला के इतिहास का आईना प्रस्तुत करती हैं। किंतु इन सबके बावजूद इस समृद्ध धरोहर को सजाने और संवारने के प्रयास कभी नहीं किए गए।

धार्मिक स्थल सालबर्डी में श्रद्धा गगन को चूमती है। शिवधाम सालबर्डी में 170 मीटर ऊंची चोटी पर भुयार नामक स्थान पर भगवान भोलेनाथ विराजमान हैं। यहां स्थापित प्राचीन शिवलिंग प्राकृतिक बताया जाता है, जिसके ऊपर से चट्टानों से निरंतर बूंद-बूंद जल गिरता रहता है। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं प्रकृति भगवान भोलेनाथ का अभिषेक कर रही हो। इस जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है और यही “छोटी गंगा” का उद्गम स्थल भी है छोटी गंगा भगवान भोलेनाथ के शीश से निकलकर मांडू नदी की जलधारा में समा जाती है।

महानुभाव पंथ का मंदिर के निचले भाग में स्थित है, जिसे “ घोड़ो की घोड़ पाक” कहा जाता है। यहां भगवान विष्णु के नौ रूपों की आकर्षक प्रतिमाएं विद्यमान हैं। सती माता का मंदिर, सीता की नहानी और निकट ही स्थित एक प्राचीन मजार भी यहां के आकर्षण हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित “पांडू कचेरी” इस स्थान की ऐतिहासिक पहचान है। यहां पांच पत्थरों के सिंहासन के साथ एक कक्ष भी स्थित है। दंतकथा के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव इसी स्थान पर रुके थे। यहां “लाक्षागृह” भी है, जो लगभग 100 मीटर ऊंची चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसमें एक विशाल हाल और तीन से अधिक कमरे हैं। इसकी भीतरी दीवारों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो कल ही इसमें आग लगाई गई हो।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित सालबर्डी प्राकृतिक सौंदर्य का अनमोल खजाना समेटे हुए है। धाम के मध्य से बहती मांडू नदी की पावन धारा और झरनों के रूप में कल-कल करती “छोटी गंगा” यहां के वातावरण को और भी रमणीय बना देती है। मांडू नदी शिव धाम सालबर्डी सबसे महत्वपूर्ण पहलू है । मांडू के चारों ओर ऊंची ऊंची चोटियों पर स्थित मंदिर और नीचे विशाल रूप से बहती मांडू नदी एक अलग लोक में पहुंच जाने का आभास कराती है। किंतु यहां सुरक्षा के इंतजाम नहीं है जिसके कारण यहां आए दिन दुर्घटनाएं भी होती है।

सालबर्डी ग्राम दो राज्यों में विभाजित है। ग्राम के मध्य से गुजरने वाली एक सड़क इसे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के हिस्सों में बांटती है, किंतु यहां के निवासियों की सांस्कृतिक विरासत एक ही है। इस ग्राम का रोचक तथ्य यह है की सड़क के एक ओर जहां महाराष्ट्र सरकार की योजनाएं क्रियान्वित होती है वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश शासन की योजनाएं चलती है। मार्ग के एक और अंधेरा होता है तो दूसरी ओर घर बिजली से रोशन होते हैं। किसी का मायका सड़क के 20 फीट दुरी पर महाराष्ट्र में है तो किसी का ससुराल 20 फीट की दूरी पर मध्य प्रदेश में है।प्रतिवर्ष यहां भरने वाले मेले के आयोजन में दोनों प्रदेशों के लोग मिलकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो आपसी सौहार्द और एकता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है।
अनेक समस्या से जूझ रहा है महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल

प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धा-सुमन अर्पित करने आने वाले श्रद्धालु भक्तों को आज भी कठिन रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। कुछ स्थानों पर रेलिंग लगा दी गई है सीढ़ियां भी बन गई है किंतु कुछ स्थान पर अब भी मार्ग अत्यंत छोटे और कठिन है जो मेले के समय गंभीर संकट का आभास दिलाते हैं। शुद्ध पेयजल की उपलब्धता के अभाव में श्रद्धालुओं के साथ आए छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं को कई मीटर की ऊंची चढ़ाई प्यासे रहकर तय करनी पड़ती है कहीं-कहीं पानी के इंतजाम किए गए हैं किंतु मेले के समय यह पर्याप्त नहीं होते। मार्ग में ठहरने की उत्तम व्यवस्था भी नहीं है। जबकि जनपद प्रभातपट्टन के लिए यह क्षेत्र आय का प्रमुख स्रोत है, किंतु शासन-प्रशासन की अनदेखी के कारण इसका सुंदर स्वरूप कभी उभर कर सामने नहीं आ पाया।

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