धर्म ध्वजावाहक जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वारूपानंद सरस्वती जी महाराज का हुआ बैकुंठ धाम गमन

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संजय द्विवेदी

बैतूल -रविवार ढलती दोपहर को धर्म ध्वजावाहक धर्म सम्राट द्वारका एवं ज्योतिष पीठाधिश्वर पूज्य महाराज जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वारूपानंद सरस्वती जी महाराज ने 99 वर्ष की आयु में नरसिंहपुर जिले के झोतेश्वर स्थित परहंसी गंगा आश्रम मे अपनी अंतिम सांस ली।

महाराज श्री बैकुंठ धाम गमन की सूचना प्राप्त होते ही भक्तो एवं धर्म प्रेमी जनों सहित सम्पूर्ण देश मे शोक की लहर दौड़ गई।भक्तों को आज सोमवार 1:30 बजे तक दर्शन हेतु समय नियत किया गया।

महाराज श्री लंबे समय से चल रहे थे अस्वस्थ –

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज बीते कई दिनो से अस्वस्थ चल रहे थे उनका उपचार जारी था। वही चार्तुमास के पूर्व महाराज श्री का आगमन तपोस्थली झोतेश्वर परमहंसी गंगा आश्रम में हुआ, जहां पर महाराज द्वारा चातुर्मास व्रत प्रारंभ किया गया था। अस्वस्थता के कारण अहमदाबाद व जबलपुर के डॉक्टरों द्वारा उपचार एवं स्वास्थ्य की देखरेख की जा रही थी ।

लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास  बनाई गई समाधि-

महाराज के ब्रहम्लीन होने की जानकारी मिलते ही भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है। समीति द्वारा महाराज श्री को स्रानदर्शन के उपरांत पालकी से कुंड स्थल पर लाया गया । जहां पर 1: 30 बजे तक भक्तो दर्शन मिल सकेंगे । झोतेश्वर स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास बने उद्यान में समाधि स्थल बना गया है । यात्रा सभी मंदिरों से होते हुए समाधि स्थल पहुंंचेगी, जहां पर अंतिम दर्शन उपरांत समाधि ग्रह कराया जावेगा ।

परिचय इस प्रकार-

महराज श्री का जन्म 2 सितम्बर 1924 को मध्यप्रदेश राज्य के सिवनी जिले के पास दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता श्री धनपति उपाध्याय और मां श्रीमती गिरिजा देवी के यहां हुआ। माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा। 9 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ कर धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दी थीं। इस दौरान वह काशी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री जी महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। यह वह समय था, जब भारत को अंग्रेजों से मुक्त करवाने की लड़ाई चल रही थी। जब 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा तो वह भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और 19 वर्ष की उम्र में वह क्रांतिकारी साधु के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसी दौरान उन्होंने वाराणसी की जेल में 9 माह एवं मध्यप्रदेश की जेल में 6 माह की सजा भी काटी । वे करपात्री जी महाराज की राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष रहे। 1940 में दंडी संन्यासी बनाये गए और 1971 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। 1980 में शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।

धर्म के लिये रहे दिया अतुल्य योगदान –

महाराज श्री महज 19 साल की उम्र में ही क्रांतिकारी साधु के रूप में उभरे चुके थे। स्वामी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती दो पीठों के शंकराचार्य थे। सनातन धर्म की रक्षा के लिए आजीवन वे संघर्षरत रहे। 1942 के स्वतंत्रता संग्राम में भी वे सक्रिय रहे । महाराजश्री का सनातन धर्म, देश और समाज के लिए अतुल्य योगदान रहा है। स्वतंत्रता सेनानी, रामसेतु रक्षक, गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करवाने वाले तथा राम जन्मभूमि के लिए लम्बा संघर्ष करने वाले, गौरक्षा आन्दोलन के प्रथम सत्याग्रही, रामराज्य परिषद् के प्रथम अध्यक्ष, पाखंडवाद के प्रबल विरोधी रहे थे। ज्ञात रहे कि शंकराचार्य ने बीती हरितालिका को ही अपना 99वां जन्मोत्सव मनाया था।

पीएम व सीएम ने दी श्रद्धांजलि-

महाराज श्री के बैकुंठ गमन की सूचना मिलते ही सम्पूर्ण देश मे शोक व्याप्त हो गया । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा महाराज श्री के बैकुंठ गमन पर शोक जताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पीएम ने कहा कि शोक के इस समय मैं उनके अनुयायियों के प्रति मेरी संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ ।

जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वारूपानंद सरस्वती जी महाराज ज्योतिपुंज थे। उनका ज्ञान प्रकाश इस धरा पर सदैव विद्यमान रहेगा।हम इंडिया न्यूज़ परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि


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