आदिवासी बहुल जिले बैतूल में पूरे माह होता है दिवाली का उल्लास,उत्कृष्ट आदिवासी लोक नृत्य को किया जाता है पुरस्कृत

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संजय द्विवेदी

बैतूल-देश भर में दीपावली पांच दिनों में समाप्त हो जाती है। मध्यप्रदेश में एक ऐसा जिला भी है, जहां दीपावली का त्यौहार एक महीने तक मनाया जाता है। बैतूल जिले में जहां के आदिवासी दीपावली को दीवाली कहते है। उनकी दीवाली की धूम पूरे महीने भर तक रहती गांव में यह पर्व अनूठे अंदाज में और आत्मीयता के साथ मनाया जाता है। है।

महीने भर तक दीपावली का पर्व मनाने की यह परंपरा आज-कल की नहीं है, बल्कि बीते कई दशकों से जारी है। जिले के आदिवासी गांवों में किस दिन यह त्यौहार कहां मनाया जाएगा, यह पहले तय किया जाता है। इसके अनुसार ही फि र त्योहार मनाने का सिलसिला शुरू होता है।

इसके बाद जिस दिन जिस गांव में दीवाली मनाना होता है। उस दिन के लिए उस गांव के लोग अपने रिश्तेदारों को आमंत्रित करते हैं। इस आमंत्रण पर उस गांव के लोगों के सभी नाते-रिश्तेदार उस गांव में एकत्रित होते हैं। दीवाली वाले दिन हर घर में परिवारों की सामथ्र्य के अनुसार पकवान आदि बनाए जाते हैं, और सभी मिलकर दीवाली का त्योहार मनाते हैं। इस दिन सामूहिक रूप से आदिवासी नृत्य आदि भी किया जाता है। अधिकतर गांवों में दीवाली का दिन ऐसा तय किया जाता है कि उस दिन वहां साप्ताहिक बाजार भी लगता हो। ऐसे में उस दिन खूब खरीददारी भी लोग करते हैं।

बाजारों में नजर आती है लोक कला-

महीने भर तक चलने वाली इस दीवाली के अलावा दीपावली पर्व के बाद जिले के कई स्थानों पर लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में भी आदिवासी नृत्य कला नजर आती है। साप्ताहिक बाजारों में आदिवासी वर्ग के लोग सामूहिक रूप से पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर पारंपरिक लोक नृत्य करते हैं। इसके बदले में लोग उन्हें स्थानीय वरिष्ठ नागरिक पुरस्कार भी देते हैं। बच्चों के लिए उनका यह लोक नृत्य खासा आकर्षण का केंद्र होता है ।

आदिवासी देवताओं की पूजाकर, मवेशियों को सजाकर कर होती है आरती-

दीपावली के बाद क्षेत्र के आदिवासी अंचलों में दिवाली की धूम लगभग एक महीने तक चलेगी। यह क्रम गुरुवार से शुरू हो गया। क्षेत्रीय आदिवासियों ने खुद के देवताओं का पूजन किया। इसके बाद गोठान पर आकर मवेशियों को सजाकर पूजा की। नाच-गाकर दिवाली की खुशियां मनाईं। ढुमकाढ़ाना में हर्ष के साथ दीपावली पर्व मनाया गया। ढुमकाढाना गांव के भगत जगदीश उइके बताते हैं कि नए फसल का अनाज का भोग गो को लगाते हैं। सुबह नहलाकर उनका शृंगार और आरती होती है। गांव का फेरा लगाकर दोपहर को गौठान का आयोजन होता है। यहां डंढार, गायकी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति भी होती है। आदिवासी पारंपरिक रूप से खुशियां मनाते हैं। 

इनका कहना-

समाजसेवी एवं आदिवासी नेता राजेश सरयाम ने बताया कि आदिवासियों में दिवाली का अत्यधिक महत्व है। इसकी तैयारी आदिवासी अंचलों में एक महीने पूर्व से हर्षोल्लास के साथ चालू हो जाती है। अलग-अलग तिथि में दीपावली मनाई जाती है। सारनी क्षैत्र के लोनिया में भी आदिवासियों ने पारंपरिक दिवाली मनाने की शुरुवात कर दी।


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