नौशेरा के शेर ब्रिगेडियर उस्मान जिनसे कापता था पाकिस्तान

जन्मदिन आज, ब्रिगेडियर उस्मान के अंतिम शब्द हम तो जा रहे हैं, पर जमीन के एक भी टुकड़े पर दुश्मन का कब्जा न होने पाये।

नौशेरा का शेर, नाम से पुकारे जाने वाले ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का आज जन्मदिन है। भारतीय सेना में देश की आन पर जान गवा देने वालों की लंबी श्रंखला है, किंतु कम ही लोग जानते होंगे कि इस क्रम का आरंभ करने वाले, देश की आन पर जान गवाने वाले पहले सैन्य अधिकारी और नौशेरा के  शेर ब्रिगेडियर उस्मान है, जिनकी शहादत मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। ब्रिगेडियर उस्मान का नाम मां भारतीय के सच्चे सपूत और वतन परस्ती की मिसाल के रूप में सदैव लिया जाएगा। ब्रिगेडियर उस्मान की शख्सियत का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान उनके नाम से कापाता था और उन पर इनाम भी घोषित कर रहा था। विभाजन के दौरान पाकिस्तान ने अनेकों प्रयास किए थे कि ब्रिगेडियर उस्मान पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बने किंतु उन्होंने मां भारती के चरणों में रहना ही स्वीकार किया और अंत में युद्ध के दौरान अपनी जान मां भारती पर वार कर सदैव के लिए रुखसत हो गए।ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान  जिन्हें पाकिस्तान के पितामह अली जिन्ना और शीर्ष के राजनेता लियाकत अली ने मुस्लिम होने का वास्ता दे कर पाक फौज में जनरल बनाने का न्यौता दिया था। किंतु उन्होंने ठुकरा दिया था,

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देश को छोड पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। 

ब्रिटेन से पढ़ कर आये मोहम्मद उस्मान 23 साल के थे। बलूच रेजीमेंट में पोस्टिंग मिली। इधर भारत-पाक का बंटवारा हो रहा था। विभाजन के समय ब्रिगेडियर उस्मान सैन्य अधिकारी थे और उस समय सैन्य अधिकारियों को छूट थी कि वह पाकिस्तानी सेना में जाना चाहते हैं या फिर हिन्दुस्तान के साथ रहना चाहते हैं। पाकिस्तान जहां तमाम सैन्य अधिकारियों को बड़े ओहदे का लालच दिखाकर अपनी सेना में शामिल कर रहा था, वहीं, ब्रिगेडियर उस्मान ने अपने देश को छोड़ कर पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। बंटवारे के बाद बलूच रेजीमेंट पाकिस्तानी सेना के हिस्से चली गयी। तब उस्मान डोगरा रेजीमेंट में आ गये। बंटवारे के बाद (1947-48) दोनों देशों में अघोषित लड़ाई चल रही थी। पाकिस्तान भारत में घुसपैठ करा रहा था। कश्मीर घाटी और जम्मू तक अशांत था। उस्मान पैराशूट ब्रिगेड की कमान संभाल रहे थे। उनकी झनगड़ में तैनाती थी। झनगड़ का पाक के लिए सामरिक महत्व था। मीरपुर और कोटली से सड़कें आकर यहीं मिलती थीं। 25 दिसंबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना ने झनगड़ को कब्जे में ले लिया। लेफ्टिनेंट जनरल के. एम. करिअप्पा तब वेस्टर्न आर्मी कमांडर थे। उन्होंने जम्मू को अपनी कमान का हेडक्वार्टर बनाया। लक्ष्य था – झनगड़ और पुंछ पर कब्जा करना और मार्च, 1948 में ब्रिगेडियर उस्मान की वीरता, नेतृत्व व पराक्रम से झनगड़ भारत के कब्जे में आ गया। उन्हें नौशेरा का शेर भी कहा जाता है।

सर कलम पर रखा था पाकिस्तान ने 50 हजार का इनाम

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तब पाक की सेना के हजार जवान मरे थे और इतने ही घायल हुए थे, जबकि भारत के 102 घायल हुए थे और 36 जवान शहीद हुए थे।पाकिस्तानी सेना झनगड़ के छिन जाने और अपने सैनिकों के मारे जाने से परेशान थी। उसने घोषणा कर दी कि जो भी उस्मान का सिर कलम कर लायेगा, उसे 50 हजार रुपये दिये जायेंगे। इधर, पाक लगातार झनगड़ पर हमले करता रहा। अपनी बहादुरी के कारण पाकिस्तानी सेना की आंखों की किरकिरी बन चुके थे उस्मान। पाक सेना घात में बैठी थी। 3 जुलाई, 1948 की शाम, पौने छह बजे होंगे उस्मान जैसे ही अपने टेंट से बाहर निकले कि उन पर 25 पाउंड का गोला पाक सेना ने दाग दिया। उनके अंतिम शब्द थे – हम तो जा रहे हैं, पर जमीन के एक भी टुकड़े पर दुश्मन का कब्जा न होने पाये।

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