मुलताई- मुलताई  तहसील के आदिवासी अंचलों से निकलकर अपनी मिठास देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचने वाला सीताफल शरीफा इस वर्ष समय से पहले आकर चंद दिनों में ही समाप्त हो गया। मुलताई क्षेत्र के बड़े भाग में सीताफल का उत्पादन होता है यह क्षेत्र बड़ा सीताफल उत्पादक क्षेत्र है

किंतु सीताफल की पैदावार से ,इस वर्ष किसानों और व्यापारियों को भारी निराशा हाथ लगी है। इसका प्रमुख कारण अति वर्षा बताया जा रहा है प्रतिवर्ष वर्षा काल समाप्ति के बाद शीत ऋतु में बाजार में आने वाला सीताफल समय से एक महा पूर्वी हि बाजार में आ गया, और इस बार पहले की तुलना में  पैदावार भी कम हुई है।

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पैदावार घटने के साथ ही पहले के वर्षों में जहां सीताफल का सीजन 2 महा चलता था, इस बार 1महा में ही सीताफल की फसल लगभग समाप्त हो गई है। उल्लेखनीय है कि मुलताई तहसील एवं छिंदवाड़ा सीमा के मध्य आदिवासी क्षेत्रों से निकलने वाला सीताफल शरीफा अपने बेहतर स्वाद के लिए संपूर्ण देश में जाना जाता है। मुलताई क्षेत्र में पैदा होने वाला सीताफल अपनी क्वालिटी अपनी मिठास और अपने स्वाद के लिए देश के बाजारों  में अलग पहचान रखता है।

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बहुत कम स्थानों पर भेजा जा रहा है सीताफल

सीताफल व्यापारी शेख राजीद बताते हैं कि इस वर्ष पैदावार बहुत घट गई है रेट में भी इजाफा हुआ है सीताफल की समय सीमा भी घट गई है जल्दी पकने लगा है, इसलिए इस बार मुलताई क्षेत्र से सीताफल को बुरहानपुर एवं गुना ही भेजा जा रहा है और वह भी पिछले वर्ष की तुलना में बहुत ही कम है। पूर्व के वर्षों में मुलताई से दिल्ली ग्वालियर अहमदाबाद आगरा सहित देश के अनेक हिस्सों में मुलताई क्षेत्र का सीताफल अपने नाम और अपनी मिठास के लिए पहचाना जाता था। जंगलों से सीताफल लाकर मुलताई मे बेचने वाली पिपरिया निवासी कचरा बाई पवार बताती है कि इस बार पैदावार बहुत ही कम हुई है, इस बार सीताफल की फसल समय से पहले ही आ गई और समय से पहले खत्म हो गई। फूलवती भाई निवासी डरगांव बताती है कि इस बार फल खराब भी बहुत हो रहे हैं ,और समय से पहले पक रहे पैदावार भी घटी है।

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सीताफल पर फफुंद एवं इल्लीयों का प्रकोप

इस वर्ष समय से पहले सीताफल के आने से जहां सीता फल की पैदावार घटी है वही सीताफल पर फफूंद और इल्लियों का प्रकोप भी देखा जा रहा है। इस वर्ष भी अगर आप अपने घर या अपने परिजनों को भेजने के लिए सीताफल की टोकरी खरीदने वाले हैं तो इस बात का ध्यान रखी थी फल कुछ समय से ज्यादा ना पकने दें और पकने पर उजाले में खाएं क्योंकि इसमें पैदा होने वाली इल्ली इसके अंदर होने वाले गूदे के कलर की होती है। जिससे इल्लियों की पहचान  कठिन हो जाती है।

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