जीवन रक्षक दवाइयों के मनमाने दाम, आम व्यक्ति पर दोहरी मार, सादे कागज पर करोड़ों का व्यापार

मुलताई -महामारी के  दौर में जीवन रक्षक दवाइयो के मनमाने दाम आम आदमी के लिए गंभीर संकट बन गए है, किंतु फिर भी मनमाने दामों पर बिकने वाली दवाइयां आम व्यक्ति खरीदने को मजबूर है । मेडिकल स्टोर पर दवाइयां खरीदने वालों की भीड़ लगी हुई है। और दवाइयां खरीदने वालों को नहीं मालूम कि उन्हें दी जाने वाली दवाइयां कितने रुपए मूल्य की है ,क्योंकि किसी भी मेडिकल दुकान पर उन्हें दवाइयों का बिल नहीं मिलता।

लॉकडाउन  को अब लगभग डेढ़ माह पूरे होने को है  और  क्षेत्र की बड़ी आबादी का रात का चूल्हा  सुबह से काम करने से ही जलता है। काम बंद है, और  आर्थिक स्थिति कमजोर, ऐसे में बीमारी और दवाइयों का भार आम आदमी के लिए बड़ी मुसीबत है । दीपक परिहार बताते हैं कि स्थानिय मेडिकल दुकानों पर दवाइयों का बिल नहीं दिया जाता और हर आदमी पढ़ा लिखा होता नहीं कि, वह दवाइयों पर लिखे प्रिंट रेट को  मिला सके। मेडिकल संचालक ग्राहकों को दी जाने वाली दवाइयों का हिसाब अपने पास रखें कोरे कागज पर लगाकर पैसे बता देता है और मेडिकल स्टोर संचालक द्वारा बताए गए पैसे देना ग्राहक की मजबूरी होती है।

कोरोना काल मे डबल हो गए  दवाइयों के दाम

उपभोक्ता बताते हैं कि ,कोरोना काल में चलने वाली दवाइयां और इंस्ट्रूमेंट बीते 2 माह में डबल कीमत के हो गए हैं। 5 रुपए का एक मिलने वाला हाथ का दस्ताना 10 और 12 रुपए का एक मिल रहा है।

आज से 2 माह पूर्व जिस ऑक्सीमीटर की कीमत 600 से 800 रू थी आज वह 2 हजार में बिक रहा है । अनेक मेडिकल स्टोर पर यह ऑक्सीमीटर डुप्लीकेट बेचे जा रहे हैं।यह ऑक्सीमीटर ऑक्सीजन लेवल ही गलत बताते हैं।

नगर के अनेक मेडिकल स्टोर पर बड़ी-बड़ी नामचीन कंपनियों के नाम के डुप्लीकेट ऑक्सीजन मीटर बेचे जाने की भी खबर है। जिसकी जांच की जानी चाहिए। कल तक जिस मल्टीविटामिन टेबलेट का पत्ता ₹50 में मिलता था आज उसी कीमत बढ़कर 100 रुपए से अधिक हो हो गई है । यही स्थिति विटामिन सी और जिंक टेबलेट की भी है। सेनीटाइजर और हैंड वॉश के दामों में भी भारी वृद्धि हुई है।

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सादे कागज पर करोड़ों का व्यापार गंभीर मामला

कागज के छोटे से चिट पर प्रतिदिन करोड़ों रुपए का व्यापार हो रहा है । बगैर बिल के मिलने वाली दवाइयों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि, डॉक्टर द्वारा लिखी गई, दवाई ही मेडिकल स्टोर से उपभोक्ता को मिली है या नहीं इसका मरीज के पास कोई प्रमाण नहीं होता ।

इसलिए अगर इस दवाई से मरीज को कोई नुकसान होता है तो इसके लिए मेडिकल स्टोर को जवाबदेह भी नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि उपभोक्ता के पास उन्हें यह दवाई किस मेडिकल स्टोर से ली है इसका कोई प्रमाण नहीं होता, राजु पवार बताते हैं कि, अनेकों बार डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाई के स्थान पर, मेडिकल स्टोर अन्य दवाई देते हैं यह भोक्ता को यह बताना भी आवश्यक नहीं समझते कि उक्त दवाई नहीं होने के कारण, दवाई का सब्सीट्यूट दिया जा रहा है। गंभीर मामला तो यह है कि दवाई जैसे गंभीर मामलों में भी प्रशासन गंभीर नहीं है ना ही इन मामलों की जांच होती है और ना ही यह देखा जाता है कि जीवन रक्षक दवाइयां बेचने वाले निर्धारित मानकों का पालन कर रहे हैं अथवा नहीं।

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