मैं नारी हूं ! 21वीं सदी में अपना प्रभुत्व लेकर आ रही हूं

श्रीमती रीता रजक बैंगलोर

मैं नारी हूं,मैं प्रकट करती हूं आदर्श, सर्जन करती हूं मानव- महामानव, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, दयानंद, विवेकानंद, अरविंद यह सब मेरी ही संताने हैं क्योंकि मैं नारी हूं

। मैं नारी हूं ।मैं अपने पति की सहधर्मिणी हूं ;और अपने पुत्र की जननी हूं ;मुझसा श्रेष्ठ संसार में और कौन है, तमाम जगत मेरा कर्मक्षेत्र है,मैं स्वाधीन हूं ,क्योंकि मैं इच्छा अनुरूप कार्य कर सकती हूं। मैं महाशक्ति का अंश हूं। मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है। मैं स्वतंत्र हूं, परंतु उच्छृंखल नहीं हूं।मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूं ,परंतु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती। मैं केवल कहती ही नहीं, करती भी हूं। मैं काम ना करूं तो संसार अचल हो जाए, सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती। पुरुष दम्भ करता है कि मैं जगत में प्रधान हूं,वह अपने दंभ व दर्प से देश को कंपाना चाहता है। वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है, और कभी रणभेरी बजाकर आकाश वायु को कंपाकर दूर दूर तक दौड़ता है, परंतु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है। क्योंकि मैं उसकी मां हूं। मैं उसकी मां केवल असहाय बचपन में ही नहीं, सर्वदा और सर्वत्र हूं। उस मातृत्व के इशारे पर सिर झुका कर चलने के लिए वह बाध्य है।

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श्रीमती रीता रजक 

‌बाहर के जगत में मेरे कर्त्तव्य का विस्तार होते हुए भी मैं अपने घर को नहीं भूलती। वह मेरे पिता, पति, भाई और पुत्र की आश्रयभूमि हैं। उन्हें यहां मेरी सुशीतल छाया नहीं मिलेगी, तो वे विश्रांति कहां पाएंगे। उनका समूचा अस्तित्व मेरी गोद में अनायास समा जाता है। यही कारण है कि मेरी कर्मभूमि उनकी कर्मभूमि से कहीं विशाल है।
          मैं पढ़ती हूं संतान को शिक्षा देने के लिए, पति के थके मन को शांति देने के लिए, मेरा ज्ञान मानव जीवन में विवेक का प्रकाश फैलाने के लिए है। मैं सीखती हूं सिखाने के लिए। शिक्षा के क्षेत्र में मेरा जन्मगत अधिकार है। मैं गुलाम नहीं पैदा करती। मैं प्रकट करती हूं आदर्श, सर्जन करती हूं मानव- महामानव, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, दयानंद, विवेकानंद, अरविंद सब मेरी ही देन है।

      मैं खड्ग धारिणी काली हूं, पाखंडों का वध करने के लिए। मैं दश प्रहरणधारिणी दुर्गा हूं, संसार में नारी शक्ति को जगाने के लिए। लक्ष्मी हूं- संसार को सुशोभन बनाने के लिए। मैं सरस्वती हूं- जगत में विद्या वितरण के लिए। मैं धरणी हूं- सहिष्णुता के गुण से। आकाश हूं- सबकी आश्रयदायिनी होने से। वायु हूं- सबको जीवनदायिनी होने से। और जल हूं- सबको रसासिक्त करने वाली- दूसरों को अपना बनाने वाली होने से। मैं ज्योति हूं– प्रकाश के कारण और मैं माटी हूं- क्योंकि मैं मां हूं ।

मेरे धर्म के विषय में मतभेद मतांतर  नहीं है। मेरा धर्म है नारीत्व- मातृत्व। मुझ में जातिभेद जनित कोई चिन्ह नहीं है। संपूर्ण नारी जाति मेरी जाती है। मैं सबसे अधिक छोटा बनना जानती हूं, परंतु मैं बड़ी स्वाभिमानिनी हूं । मैं मनुष्य को गोद में खिलाकर मनुष्य बनाती हूं। उसके शरीर की धूलि से अपना शरीर मैला करती हूं , इसलिए कि मैं यह सब सह सकती हूं।
      रामायण और महाभारत में मेरी ही कथाएं हैं।यही कारण है कि जडत को और जगत के लोगों को जीवन विद्या का शिक्षण देने में इनके समान अन्य कोई भी ग्रंथ समर्थ नहीं हुआ। मैं दूसरी भाषा सीखती हूं, परंतु बोलती हूं अपनी ही भाषा, और मेरी संतान इसलिए उसे गौरव के साथ मातृभाषा कहती है।

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