हम सोचते हिंदी में है, हमें सपने हिंदी में आते हैं, हमारी भावनाएं हिंदी के साथ व्यक्त होती है

असलम अहमद

अपनों से अपनी बात

म सोचते हिंदी में है, हमें सपने हिंदी में आते हैं हमारी भावनाएं हिंदी के साथ व्यक्त होती है, तो फिर हम इंग्लिश बोलने पर गर्व महसूस क्यों करते हैं ? क्या अपने भाव को हम अपनी मातृभाषा के अलावा भी किसी भाषा में अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं ?क्या हम  अपनी मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा के साथ सहज महसूस कर सकते हैं ? क्या हिंदी भाषी हिंदी के अलावा किसी दूसरी भाषा को अपने आवभाव से व्यक्त कर सकते हैं ? इसका उत्तर होगा नहीं ! फिर यह कैसा मिथक है कि हम हिंदी को छोड़ अपने जीवन में दूसरी भाषा को स्वीकार्यता देकर ही विकासशील हो सकते हैं। अब हमें समझना होगा कि हमारी अभिव्यक्ति, हमारा विकास हमारी सोच पर निर्भर है और हमारी सोच हिंदी है |

यह कैसी विवशता

आज ही के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था । आज हम हिंदी को याद करते हैं। सप्ताह भर हिंदी दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम होते हैं। किंतु फिर क्या कारण है कि हम अंग्रेजी बोलने पर गर्व महसूस करने लगते हैं ।अपने बच्चों को इंग्लिश कान्वेंट में पढ़ाना अपना सौभाग्य समझते हैं। बच्चा इंग्लिश में बात करें तो हम फुले नहीं समाते। दूसरों पर रौब जमाने के लिए गलत सलत ही सही इंग्लिश शब्दों का इस्तेमाल बोलचाल में करते हैं। यह प्रयास हिंदी को शुद्ध करने, शुद्ध बोलने और शुद्ध रूप से समझने के लिए नहीं किए जाते ,हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिले 47 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं किंतु अब तक हम हिंदी को विभागीय प्रणाली का पूर्ण अंग नहीं बना सके। 

हिंदी से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य

प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंहा का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए।

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