जियो और जीने दो ,अहिंसा परमो धर्म का संदेश दे गया,पर्यूषण पर्व,

सादगी से मनाया गया पर्यूषण पर्व

असलम अहमद

जैन धर्म का अत्यंत पवित्र पर्यूषण पर्व कोरोना के चलते सादगी पूर्ण बनाया गया, नगर में स्थित प्राचीन पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की गई किंतु अधिकांश धार्मिक कार्यक्रम घरों में ही आयोजित किए गए। नगर का जैन मंदिर  अत्यंत प्राचीन मंदिर  माना जाता है  इस मंदिर में  रखी  पार्श्वनाथ भगवान  की प्रतिमा  प्राचीन सिद्ध प्रतिमा मानी जाती है मुक्तागिरी के बाद मुलताई के दिगंबर जैन मंदिर का अपना धार्मिक महत्व है यहां पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा के अलावा भगवान बाहुबली, महावीर स्वामी आदि प्रतिमाएं भी महिमामई मानी जाती है। ऋषि पंचमी से प्रारंभ होकर यह पर्व अनंत चौदस को उत्तम क्षमा पर्व के साथ समाप्त होता है। और मानव जाति को अहिंसा परमो धर्म, जियो और जीने दो का संदेश देता है।  इस दिन वर्ष भर में जीव जंतु पशु से लेकर मनुष्य तक किसी भी रूप में जाने अनजाने में हुई गलतियों की क्षमा मांगी जाती है और क्षमा पर्व का अपना धार्मिक एवं अध्यात्मिक महत्त्व है। पर्यूषण पर्व पर नगर के प्रसिद्ध पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर जिनवर, पूजन, अभिषेक एवं आरती का आयोजन इस वर्ष सादगी पूर्ण किया गया। प्रतिवर्ष इस दिन मंदिर में विभिन्न आयोजन किए जाते हैं जिसमें दूर दूर से लोग मुलताई पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

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उत्तम क्षमा  हमारी आत्मा को सही राह खोजने मे और क्षमा को जीवन और व्यवहार में लाना सिखाता है ,जिससे सम्यक दर्शन प्राप्त होता है । सम्यक दर्शन वो भाव है जो आत्मा को कठोर तप त्याग की कुछ समय की यातना सहन करके परम आनंद मोक्ष को पाने का प्रथम मार्ग है ।इस दिन बोला जाता है- मिच्छामि दुक्कडं,सबको क्षमा सबसे क्षमा ,जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्‍मा की शुद्धि को सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया जाता है।

पूर्व पार्षद राजू जैन- बताते हैं कि यह 10 दिनों का पर्व होता है जिसमें पूजन, पाठ, व्रत का विधान होता है जो  गुरु के सानिध्य में रखे जाते हैं। कोरोना के चलते इस वर्ष सादगी पूर्ण यह पर्व मनाया गया। मुलताई में स्थित जैन मंदिर का अपना महत्व है यहां दो जैन मुनियों ने समाधिया ली है । एक दो तीन सौ साल पूर्व हुई थी, और एक श्री श्रेष्ठ महाराज ने 3 वर्ष पूर्व यहां समाधि ली है। जिनके समाधि उनके खेत में स्थित है।

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पूर्व नगरपालिका उपाध्यक्ष  यवनींद्र जैन -बताते हैं कि ऋषि पंचमी से अनंत चौदस तक चलने वाला यह पर्व, आत्म शुद्धि का पर्व होता है ,जिसमें उत्तम क्षमा- क्रोध का दमन, उत्तम मार्दव -भाषा पर संयम, उत्तम आर्जन- जीवन में सरलता लाना, उत्तम सौच, लोभ लालच को समाप्त करने जैसे 10 कर्म पर आधारित होता है।

एसके जैन- बताते हैं कि प्रतिवर्ष नगर के प्रसिद्ध पार्श्वनाथ जैन मंदिर में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं धार्मिक आयोजन बड़े रूप में किए जाते रहे हैं किंतु इस वर्ष कोरोना काल चलते, सादगी पूर्ण मनाया गया ।मंदिर में अभिषेक पूजन की विधि पूर्ण की गई बाकी सभी धार्मिक आयोजन घर पर रहकर ही पूर्ण किए गए।

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मिच्छामि दुक्कडं,सबको क्षमा ,सबसे क्षमा ,

हम उनसे क्षमा मांगते है जिनके साथ हमने बुरा व्यवहार किया हो और उन्हें क्षमा करते है जिन्होंने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया हो। सिर्फ इंसानो के लिए हि नहीं बल्कि हर एक इन्द्रिय से पांच इन्द्रिय जीवो के प्रति जिनमें जीवन है उनके प्रति भी ऐसा भाव रखते हैं ।उत्तम क्षमा  हमारी आत्मा को सही राह खोजने मे और क्षमा को जीवन और व्यवहार में लाना सिखाता है ,जिससे सम्यक दर्शन प्राप्त होता है । सम्यक दर्शन वो भाव है जो आत्मा को कठोर तप त्याग की कुछ समय की यातना सहन करके परम आनंद मोक्ष को पाने का प्रथम मार्ग है ।इस दिन बोला जाता है- मिच्छामि दुक्कडं,सबको क्षमा सबसे क्षमा ,जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्‍मा की शुद्धि को सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया जाता है प्रत्‍येक समय हमारे द्वारा किये गये अच्‍छे या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें अवश्‍य भोगना पड़ता है। शुभ कर्म जीवन व आत्‍मा को उच्‍च स्‍थान तक ले जाता है, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्‍मा मलिन होती जाती है।

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